भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1120, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1120

राजधर्मशरीरं च पक्षास्थिचरणोज्झितम् । तदनन्तर कुछ ही दूर जानेपर राक्षसोंने गौतमको पकड़ लिया। साथ ही उन्हें पंख, पैर और हड्डियोंसे रहित राजधर्माकी लाश भी मिल गयी ॥ १३ १/२ ॥ तमादायाथ रक्षांसि द्रुतं मेरुव्रजं ययुः ॥ १४ ॥ राज्ञश्च दर्शयामासुः शरीरं राजधर्मणः । कृतघ्नं परुषं तं च गौतमं पापकारिणम् ॥ १५ ॥ गौतमको लेकर वे राक्षस शीघ्र ही मेरुव्रजमें गये। वहाँ उन्होंने राजाको राजधर्माका मृत शरीर दिखाया और पापाचारी कृतघ्न गौतमको भी सामने खड़ा कर दिया ॥ रुरोद राजा तं दृष्ट्वा सामात्यः सपुरोहितः । आर्तनादश्च सुमहानभूत् तस्य निवेशने ॥ १६ ॥ सस्त्रीकुमारं च पुरं बभूवास्वस्थमानसम् । अपने मित्रको इस दशामें देखकर मन्त्री और पुरोहितोंके साथ राजा विरूपाक्ष फूट-फूटकर रोने लगे। उनके महलमें महान् आर्तनाद गूँजने लगा। स्त्री और बच्चोंसहित सारे नगरमें शोक छा गया। किसीका भी मन स्वस्थ न रहा ॥ अथाब्रवीन्नृपः पुत्रं पापोऽयं वध्यतामिति ॥ १७ ॥ अस्य मांसैरिमे सर्वे विहरन्तु यथेष्टतः । तब राजाने अपने पुत्रको आज्ञा दी—'बेटा! इस पापीको मार डालो। ये समस्त राक्षस इसके मांसका यथेष्ट उपयोग करें ॥ १७ १/२ ॥ पापाचारः पापकर्मा पापात्मा पापसाधनः ॥ १८ ॥ हन्तव्योऽयं मम मतिर्भवद्भिरिति राक्षसाः । 'राक्षसो! यह पापाचारी, पापकर्मा और पापात्मा है। इसके सारे साधन पापमय हैं; अतः तुम्हें इसका वध कर देना चाहिये, यही मेरा मत है' ॥ १८ १/२ ॥ इत्युक्ता राक्षसेन्द्रेण राक्षसा घोरविक्रमाः ॥ १९ ॥ नैच्छन्त तं भक्षयितुं पापकर्माणमित्युत । राक्षसराजके इस प्रकार आदेश देनेपर भी भयानक पराक्रमी राक्षसोंने गौतमको खानेकी इच्छा नहीं की; क्योंकि वह घोर पापाचारी था ॥ १९ १/२ ॥ दस्यूनां दीयतामेष साध्वद्य पुरुषाधमः ॥ २० ॥ इत्यूचुस्ते महाराज राक्षसेन्द्रं निशाचराः । शिरोभिः प्रणताः सर्वे व्याहरन् राक्षसाधिपम् ॥ २१ ॥ न दातुमर्हसि त्वं नो भक्षणायस्य किल्विषम् ।