महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1130, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्नेहपाशैर्बहुविधैराविष्टविषया जनाः । अकृतार्थाश्च सीदन्ते जलैः सैकतसेतवः ॥ २३ ॥ मनुष्य नाना प्रकारके स्नेह-बन्धनोंमें बँधे हुए हैं, अतः वे सदा विषयोंकी आसक्तिसे घिरे रहते हैं; इसीलिये जैसे बालूद्वारा बनाये हुए पुल जलके वेगसे बह जाते हैं, उसी प्रकार उन मनुष्योंकी विषयकामना सफल नहीं होती; जिससे वे दुःख पाते रहते हैं ॥ २३ ॥
स्नेहेन तिलवत् सर्वं सर्गचक्रे निपीड्यते । तिलपीडैरिवाक्रम्य क्लेशैरज्ञानसम्भवैः ॥ २४ ॥ तेलीलोग तेलके लिये जैसे तिलोंको कोल्हूमें पेरते हैं, उसी प्रकार स्नेहके कारण सब लोग अज्ञानजनित क्लेशोंद्वारा सृष्टिचक्रमें पिस रहे हैं ॥ २४ ॥
संचिनोत्यशुभं कर्म कलत्रापेक्षया नरः । एकः क्लेशानवाप्नोति परत्रेह च मानवः ॥ २५ ॥ मनुष्य स्त्री-पुत्र आदि कुटुम्बके लिये चोरी आदि पाप कर्मोंका संग्रह करता है; किंतु इस लोक और परलोकमें उसे अकेले ही उन समस्त कर्मोंका क्लेशमय फल भोगना पड़ता है ॥ २५ ॥
पुत्रदारकुटुम्बेषु प्रसक्ताः सर्वमानवाः । शोकपङ्कार्णवे मरना जीर्णा वनगजा इव ॥ २६ ॥ स्त्री, पुत्र और कुटुम्बमें आसक्त हुए सभी मनुष्य उसी प्रकार शोकके समुद्रमें डूब जाते हैं जैसे बूढ़े जंगली हाथी दलदलमें फँसकर नष्ट हो जाते हैं ॥ २६ ॥
पुत्रनाशे वित्तनाशे ज्ञातिसम्बन्धिनामपि । प्राप्यते सुमहद् दुखं दावाग्निप्रतिमं विभो । दैवायत्तमिदं सर्वं सुखदुःखे भवाभवौ ॥ २७ ॥ प्रभो! यहाँ सब लोगोंको पुत्र, धन, कुटुम्बी तथा सम्बन्धियोंका नाश होनेपर दावानलके समान दाह उत्पन्न करनेवाला महान् दुःख प्राप्त होता है; परंतु सुख-दुःख और जन्म-मृत्यु आदि यह सब कुछ प्रारब्धके ही अधीन है ॥
असुहृत् ससुहृच्चापि सशत्रुर्मित्रवानपि । सप्रज्ञः प्रज्ञया हीनो दैवेन लभते सुखम् ॥ २८ ॥ मनुष्य हितैषी सुहृदोंसे युक्त हो या न हो, वह शत्रुके साथ हो या मित्रके, बुद्धिमान् हो या बुद्धिहीन, दैवकी अनुकूलता होनेपर ही सुख पाता है ॥ २८ ॥
नालं सुखाय सुहृदो नालं दुःखाय शत्रवः । न च प्रज्ञालमर्थानां न सुखानामलं धनम् ॥ २९ ॥ अन्यथा न तो सुहृद् सुख देनेमें समर्थ हैं, न शत्रु दुःख देनेमें समर्थ हैं, न तो बुद्धि धन देनेकी शक्ति रखती है और न धन ही सुख देनेमें समर्थ होता है ॥
न बुद्धिर्धनलाभाय न जाड्यबमसमृद्धये ।