महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1131, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंलोकपर्यायवृत्तान्तं प्राज्ञो जानाति नेतरः ॥ ३० ॥ न तो बुद्धि धनकी प्राप्तिमें कारण है, न मूर्खता निर्धनतामें, वास्तवमें संसारचक्रकी गतिका वृत्तान्त कोई ज्ञानी पुरुष ही जान पाता है, दूसरा नहीं ॥ ३० ॥
बुद्धिमन्तं च शूरं च मूढं भीरुं जडं कविम् । दुर्बलं बलवन्तं च भागिनं भजते सुखम् ॥ ३१ ॥ बुद्धिमान्, शूरवीर, मूढ़, डरपोक, गूँगा, विद्वान्, दुर्बल और बलवान् जो भी भाग्यवान् होगा—दैव जिसके अनुकूल होगा, उसे बिना यत्नके ही सुख प्राप्त होगा ॥
धेनुर्वत्सस्य गोपस्य स्वामिनस्तस्करस्य च । पयः पिबति यस्तस्या धेनुस्तस्येति निश्चयः ॥ ३२ ॥ दूध देनेवाली गौ बछड़ेकी है या उसे दुहने अथवा चरानेवाले ग्वालेकी है; या रखनेवाले मालिककी है। अथवा उसे चुराकर ले जानेवाले चोरकी है? वास्तवमें जो उसका दूध पीता है, उसीकी वह गाय है—ऐसा विद्वानोंका निश्चय है ॥ ३२ ॥
ये च मूढतमा लोके ये च बुद्धेः परं गताः । ते नराः सुखमेधन्ते क्लिश्यत्यन्तरितो जनः ॥ ३३ ॥ इस संसारमें जो अत्यन्त मूढ़ हैं और जो बुद्धिसे परे पहुँच गये हैं, वे ही मनुष्य सुखी हैं। बीचके सभी लोग कष्ट भोगते हैं ॥ ३३ ॥
अन्त्येषु रेमिरे धीरा न ते मध्येषु रेमिरे । अन्त्यप्राप्तिं सुखामाहुर्दुःखमन्तरमन्त्ययोः ॥ ३४ ॥ ज्ञानी पुरुष अन्तिम स्थितियोंमें रमण करते हैं, मध्यवर्ती स्थितिमें नहीं। अन्तिम स्थितिकी प्राप्ति सुखस्वरूप बतायी जाती है और उन दोनोंके मध्यकी स्थिति दुःखरूप कही गयी है ॥ ३४ ॥
(सुखं स्वपिति दुर्मेधाः स्वानि कर्माण्यचिन्तयन् । अविज्ञानेन महता कम्बलेनेव संवृतः ॥) खोटी बुद्धिवाला मूर्ख मनुष्य अपने कर्मोंके शुभाशुभ परिणामकी कोई परवा न करके सुखसे सोता है; क्योंकि वह कम्बलसे ढके हुए पुरुषकी भाँति महान् अज्ञानसे आवृत रहता है ॥
ये च बुद्धिसुखं प्राप्ता द्वन्द्वातीता विमत्सराः । तान् नैवार्था न चानर्था व्यथयन्ति कदाचन ॥ ३५ ॥ किंतु जिन्हें ज्ञानजनित सुख प्राप्त है, जो द्वन्द्वोंसे अतीत हैं तथा जिनमें मत्सरताका भी अभाव है, उन्हें अर्थ और अनर्थ कभी पीड़ा नहीं देते हैं ॥ ३५ ॥
अथ ये बुद्धिमप्राप्ता व्यतिक्रान्ताश्च मूढताम् । तेऽतिवेलं प्रहृष्यन्ति संतापमुपयान्ति च ॥ ३६ ॥