महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1132, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो मूढ़ताको तो लाँघ चुके हैं, परंतु जिनको ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है, वे सुखकी परिस्थिति आनेपर अत्यन्त हर्षसे फूल उठते हैं और दुःखकी परिस्थितिमें अतिशय संतापका अनुभव करने लगते हैं ॥ ३६ ॥ नित्यं प्रमुदिता मूढा दिवि देवगणा इव । अवलेपेन महता परिभूत्या विचेतसः ॥ ३७ ॥ मूर्ख मनुष्य स्वर्गमें देवताओंकी भाँति सदा विषयसुखमें मग्न रहते हैं; क्योंकि उनका चित्त विषया-सक्तिके कीचड़में लथपथ होकर मोहित हो जाता है ॥ सुखं दुःखान्तमालस्यं दुःखं दाक्ष्यं सुखोदयम् । भूतिस्त्वेवं श्रिया सार्धं दक्षे वसति नालसे ॥ ३८ ॥ आरम्भमें आलस्य सुख-सा जान पड़ता है; परंतु वह अन्तमें दुःखदायी होता है और कार्यकौशल दुःख-सा लगता है; परंतु वह सुखका उत्पादक है। कार्यकुशल पुरुषमें ही लक्ष्मीसहित ऐश्वर्य निवास करता है, आलसीमें नहीं ॥ ३८ ॥ सुखं वा यदि वा दुःखं प्रियं वा यदि वाप्रियम् । प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः ॥ ३९ ॥ अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि सुख या दुःख, प्रिय अथवा अप्रिय, जो-जो प्राप्त हो जाय, उसका हृदयसे स्वागत करे, कभी हिम्मत न हारे ॥ ३९ ॥ शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च । दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥ ४० ॥ शोकके हजारों स्थान हैं और भयके सैकड़ों स्थान हैं; किंतु वे प्रतिदिन मूर्खोंपर ही प्रभाव डालते हैं, विद्वानोंपर नहीं ॥ ४० ॥ बुद्धिमन्तं कृतप्रज्ञं शुश्रूषमनसूयकम् । दान्तं जितेन्द्रियं चापि शोको न स्पृशते नरम् ॥ ४१ ॥ जो बुद्धिमान्, ऊहापोहमें कुशल एवं शिक्षित बुद्धिवाला, अध्यात्मशास्त्रके श्रवणकी इच्छा रखनेवाला, किसीके दोष न देखनेवाला, मनको वशमें रखनेवाला और जितेन्द्रिय है, उस मनुष्यको शोक कभी छू भी नहीं सकता ॥ ४१ ॥ एतां बुद्धिं समास्थाय गुप्तचित्तश्चरेद् बुधः । उदयास्तमयज्ञं हि न शोकः स्प्रष्टुमर्हति ॥ ४२ ॥ विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह इसी विचारका आश्रय लेकर मनको काम, क्रोध आदि शत्रुओंसे सुरक्षित रखते हुए उत्तम बर्ताव करे। जो उत्पत्ति और विनाशके तत्त्वको जानता है, उसे शोक छू नहीं सकता ॥ ४२ ॥ यन्निमित्तं भवेच्छोकस्तापो वा दुःखमेव च । आयासो वा यतो मूलमेकाङ्गमपि तत् त्यजेत् ॥ ४३ ॥