महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1149, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंआसीनमुष्ट्रं मध्येन सहसैवाभ्यधावताम् ॥ ६ ॥ एक दिन उन दोनों बछड़ोंको परस्पर जोड़कर वे हल चलानेकी शिक्षा देनेके लिये ले जा रहे थे। जब वे दोनों बछड़े गाँवसे बाहर निकले तो बैठे हुए एक ऊँटको बीचमें करके सहसा दौड़ पड़े ॥ ६ ॥
तयोः सम्प्राप्तयोरुष्ट्रः स्कन्धदेशममर्षणः । उत्थायोत्क्षिप्य तौ दम्यौ प्रससार महाजवः ॥ ७ ॥ जब वे उसकी गर्दनके पास पहुँचे तो ऊँटके लिये यह असह्य हो उठा। वह रोषमें भरकर खड़ा हो गया और उन दोनों बछड़ोंको ऊपर लटकाये बड़े जोरसे भागने लगा ॥ ७ ॥
ह्रियमाणौ तु तौ दम्यौ तेनोष्ट्रेण प्रमाथिना । म्रियमाणौ च सम्प्रेक्ष्य मङ्किस्तत्राब्रवीदिदम् ॥ ८ ॥ बलपूर्वक अपहरण करनेवाले उस ऊँटके द्वारा उन दोनों बछड़ोंको अपहृत होते और मरते देख मङ्किने इस प्रकार कहा— ॥ ८ ॥
न चैवाविहितं शक्यं दक्षेणापीहितुं धनम् । युक्तेन श्रद्धया सम्यगीहां समनुतिष्ठता ॥ ९ ॥ ‘मनुष्य कैसा ही चतुर क्यों न हो, जो उसके भाग्यमें नहीं है, उस धनको वह श्रद्धापूर्वक भलीभाँति प्रयत्न करके भी नहीं पा सकता ॥ ९ ॥
कृतस्य पूर्वं चानर्थैर्युक्तस्याप्यनुतिष्ठतः । इमं पश्यत संगत्या मम दैवमुपप्लवम् ॥ १० ॥ ‘पहले मैंने जो प्रयत्न किया था उसमें अनेक प्रकारके अनर्थ खड़े हो गये थे। उन अनर्थोंसे युक्त होनेपर भी मैं धनोपार्जनकी ही चेष्टामें लगा रहा; परंतु देखो, आज इन बछड़ोंकी सङ्गतिसे मुझपर कैसा दैवी उपद्रव आ गया? ॥ १० ॥
उद्यम्योद्यम्य मे दम्यौ विषमेणैव गच्छतः । उत्क्षिप्य काकतालीयमुत्पथेनैव धावतः ॥ ११ ॥ मणी वोष्ट्रस्य लम्बेते प्रियौ वत्सतरौ मम । शुद्धं हि दैवमेवेदं हठेनैवास्ति पौरुषम् ॥ १२ ॥ ‘यह ऊँट मेरे बछड़ोंको उछाल-उछालकर विषम मार्गसे ही जा रहा है। काकतालीयन्यायसे* (अर्थात् दैवसंयोगसे) इन्हें गर्दनपर उठाकर बुरे मार्गसे ही दौड़ रहा है। इस ऊँटके गलेमें मेरे दोनों प्यारे बछड़े दो मणियोंके समान लटक रहे हैं। यह केवल दैवकी ही लीला है। हठपूर्वक किये हुए पुरुषार्थसे क्या होता है? ॥ ११-१२ ॥
यदि वाप्युपपद्येत पौरुषं नाम कर्हिचित् । अन्विष्यमाणं तदपि दैवमेवावतिष्ठते ॥ १३ ॥