भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1150

'यदि कभी कोई पुरुषार्थ सफल होता दिखायी देता है तो वहाँ भी खोज करनेपर दैवका ही सहयोग सिद्ध होता है ।। १३ ।। तस्मान्निर्वेद एवेह गन्तव्यः सुखमिच्छता । सुखं स्वपिति निर्विण्णो निराशश्चार्थसाधने ।। १४ ।। 'अतः सुखकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको धन आदिकी ओरसे वैराग्यका ही आश्रय लेना चाहिये। धनोपार्जनकी चेष्टासे निराश होकर जो विरक्त हो जाता है, वह सुखकी नींद सोता है ।। १४ ।। अहो सम्यक् शुकेनोक्तं सर्वतः परिमुच्यता । प्रतिष्ठता महारण्यं जनकस्य निवेशनात् ।। १५ ।। 'अहा! शुकदेव मुनिने जनकके राजमहलसे विशाल वनकी ओर जाते समय सब ओरसे बन्धनमुक्त हो क्या ही अच्छा कहा था? ।। १५ ।। यः कामानाप्नुयात् सर्वान् यश्चैतान् केवलांस्त्यजेत् । प्रापणात् सर्वकामानां परित्यागो विशिष्यते ।। १६ ।। “जो मनुष्य अपनी समस्त कामनाओंको पा लेता है; तथा जो इन सबका केवल त्याग कर देता है—इन दोनोंके कार्योंमें समस्त कामनाओंको प्राप्त करनेकी अपेक्षा उनका त्याग ही श्रेष्ठ है ।। १६ ।। नान्तं सर्वविधित्सानां गतपूर्वोऽस्ति कश्चन । शरीरे जीविते चैव तृष्णा मन्दस्य वर्धते ।। १७ ।। 'कोई भी पहले कभी धन आदिके लिये होनेवाली सम्पूर्ण प्रवृत्तियोंका अन्त नहीं पा सका है। शरीर और जीवनके प्रति मूर्ख मनुष्यकी ही तृष्णा बढ़ती है ।। १७ ।। निवर्तस्व विधित्साभ्यः शाम्य निर्विद्य कामुक । असकृच्चासि निकृतो न च निर्विद्यसे ततः ।। १८ ।। 'ओ कामनाओंके दास मन! तू सब प्रकारकी चेष्टाओंसे निवृत्त हो जा और वैराग्यपूर्वक शान्ति धारण कर। तू धनकी चेष्टा करके बारंबार ठगा गया है तो भी उसकी ओरसे वैराग्य नहीं होता है ।। १८ ।। यदि नाहं विनाश्यस्ते यद्येवं रमसे मया । मा मां योजय लोभेन वृथा त्वं वित्तकामुक ।। १९ ।। 'ओ धनकी कामनावाले मन! यदि तुझे मेरा विनाश नहीं करना है, यदि तू इसी प्रकार मेरे साथ आनन्दपूर्वक रहना चाहता है तो मुझे व्यर्थ लोभमें न फँसा ।। १९ ।। संचितं संचितं द्रव्यं नष्टं तव पुनः पुनः । कदाचिन्मोक्ष्यसे मूढ धनेहां धनकामुक ।। २० ।। 'तूने बार-बार द्रव्यका संचय किया और वह बारंबार नष्ट होता चला गया। धनकी इच्छा रखनेवाले मूढ! क्या कभी तू धनकी इस तृष्णा और चेष्टाका त्याग भी