भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1257, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1257

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

जापकमें दोष आनेके कारण उसे नरककी प्राप्ति

युधिष्ठिर उवाच

गतीनामुत्तमा प्राप्तिः कथितां जापकेष्विह ।
एकैवैषा गतिस्तेषामुत यान्त्यपरामपि ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! आपने यहाँ जापकोंके लिये गतियोंमें उत्तम गतिकी प्राप्ति बतायी है। क्या उनके लिये एकमात्र यही गति है? या वे किसी दूसरी गतिको भी प्राप्त होते हैं? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

शृणुष्वावहितो राजन् जापकानां गतिं विभो ।
यथा गच्छन्ति निरयाननेकान् पुरुषर्षभ ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! तुम सावधान होकर जापकोंकी गतिका वर्णन सुनो। प्रभो! पुरुषप्रवर! अब मैं यह बता रहा हूँ कि वे किस तरह नाना प्रकारके नरकोंमें पड़ते हैं* ॥ २ ॥

यथोक्तपूर्वं पूर्वं यो नानुतिष्ठति जापकः ।
एकदेशक्रियश्चात्र निरयं स च गच्छति ॥ ३ ॥
जो जापक जैसा पहले बताया गया है, उसी तरह नियमोंका ठीक-ठीक पालन नहीं करता, एकदेशका ही अनुष्ठान करता है अर्थात् किसी एक ही नियमका पालन करता है, वह नरकमें पड़ता है ॥ ३ ॥

अवमानेन कुरुते न प्रीयति न हृष्यति ।
ईदृशो जापको याति निरयं नात्र संशयः ॥ ४ ॥
जो अवहेलनापूर्वक जप करता है, उसके प्रति प्रेम या प्रसन्नता नहीं प्रकट करता है, ऐसा जापक भी निःसंदेह नरकमें ही पड़ता है ॥ ४ ॥

अहङ्कारकृतश्चैव सर्वे निरयगामिनः ।
परावमानी पुरुषो भविता निरयोपगः ॥ ५ ॥
जपके कारण अपनेमें बड़प्पनका अभिमान करनेवाले सभी जापक नरकगामी होते हैं। दूसरोंका अपमान करनेवाला जापक भी नरकमें ही पड़ता है ॥ ५ ॥

अभिध्यापूर्वकं जप्यं कुरुते यश्च मोहितः ।
यत्राभिध्यां स कुरुते तं वै निरयमृच्छति ॥ ६ ॥