महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1258, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो मोहित हो फलकी इच्छा रखकर जप करता है, वह जिस फलका चिन्तन करता है, उसीके उपयुक्त नरकमें पड़ता है॥ ६॥ अथैश्वर्यप्रवृत्तेषु जापकस्तत्र रज्यते। स एव निरयस्तस्य नासौ तस्मात् प्रमुच्यते॥ ७॥ यदि जप करनेवाले साधकको अणिमा आदि ऐश्वर्य प्राप्त हों और वह उनमें अनुरक्त हो जाय तो वह ही उसके लिये नरक है, वह उससे छुटकारा नहीं पाता है॥ रागेण जापको जप्यं कुरुते तत्र मोहितः। यत्रास्य रागः पतति तत्र तत्रोपपद्यते॥ ८॥ जो जापक मोहके वशीभूत हो विषयासक्तिपूर्वक जप करता है, वह जिस फलमें उसकी आसक्ति होती है, उसीके अनुरूप शरीरको प्राप्त होता है। इस प्रकार उसका पतन हो जाता है॥ ८॥ दुर्बुद्धिरकृतप्रज्ञश्चले मनसि तिष्ठति। चलामेव गतिं याति निरयं वा नियच्छति॥ ९॥ जिसकी बुद्धि भोगोंमें आसक्तिके कारण दूषित है तथा जो विवेकशील नहीं है, वह जापक यदि मनके चंचल रहते हुए ही जप करता है तो विनाशशील गतिको प्राप्त होता है अथवा नरकमें गिरता है। अर्थात् विनाशशील या स्वर्गादि विचलित स्वभाववाले लोकोंको प्राप्त होता है या तिर्यक्-योनियोंमें जाता है॥ ९॥ अकृतप्रज्ञको बालो मोहं गच्छति जापकः। स मोहान्निरयं याति तत्र गत्वानुशोचति॥ १०॥ जो विवेकशून्य मूढ़ जापक मोहग्रस्त हो जाता है, वह उस मोहके कारण नरकमें गिरता है और उसमें गिरकर निरन्तर शोकमग्न रहता है॥ १०॥ दृढग्राही करोमीति जाप्यं जपति जापकः। न सम्पूर्णो न संयुक्तो निरयं सोऽनुगच्छति॥ ११॥ ‘मैं निश्चय ही जपका अनुष्ठान पूरा करूँगा,’ ऐसा दृढ़ आग्रह रखकर जो जापक जपमें प्रवृत्त होता है, परंतु न तो उसमें अच्छी तरह संलग्न होता है और न उसे पूरा ही कर पाता है, वह नरकमें गिरता है॥ ११॥
युधिष्ठिर उवाच
अनिवृत्तं परं यत्तदव्यक्तं ब्रह्मणि स्थितम्। तद्भूतो जापकः कस्मात् स शरीरमिहाविशेत्॥ १२॥ युधिष्ठिरने पूछा— जो कभी निवृत्त न होनेवाला सनातन अव्यक्त ब्रह्म है, उस गायत्रीके जपमें स्थित रहने-वाला एवं उससे भावित हुआ जापक किस कारणसे यहाँ शरीरमें प्रवेश करता है अर्थात् पुनर्जन्म ग्रहण करता है?॥