भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1273

न युक्तं तु मृषा वाणी त्वया वक्तुमरंदम । तथा मयाप्यभिहितं मिथ्या कर्तुं न शक्यते ॥ ५८ ॥ शत्रुदमन नरेश! आपके लिये भी झूठ बोलना उचित नहीं है और मैं भी अपनी कही हुई बातको मिथ्या नहीं कर सकता ॥ ५८ ॥

संश्रुतं च मया पूर्वं ददानीत्यविचारितम् । तद् गृहीष्वाविचारेण यदि सत्ये स्थितो भवान् ॥ ५९ ॥ मैंने बिना कुछ सोच-विचार किये ही पहले देनेकी प्रतिज्ञा कर ली है; अतः आप भी बिना विचारे मेरा दिया हुआ जप ग्रहण करें। यदि आप सत्यपर दृढ़ हैं तो आपको ऐसा अवश्य करना चाहिये ॥ ५९ ॥

इहागम्य हि मां राजन् जाप्यं फलमयाचथाः । तन्मे निसृष्टं गृहीष्व भव सत्ये स्थिरोऽपि च ॥ ६० ॥ राजन्! आपने स्वयं यहाँ आकर मुझसे जपके फलकी याचना की है और मैंने उसे आपके लिये दे दिया है; अतः आप उसे ग्रहण करें और सत्यपर डटे रहें ॥

नायं लोकोऽस्ति न परो न च पूर्वान् स तारयेत् । कुत एव जनिष्यांस्तु मृषावादपरायणः ॥ ६१ ॥ जो झूठ बोलनेवाला है, उस मनुष्यको न इस लोकमें सुख मिलता है और न परलोकमें ही। वह अपने पूर्वजोंको भी नहीं तार सकता; फिर भविष्यमें होनेवाली संततिका उद्धार तो कर ही कैसे सकता है? ॥

न यज्ञाध्ययने दानं नियमास्तारयन्ति हि । यथा सत्यं परे लोके तथेह पुरुषर्षभ ॥ ६२ ॥ पुरुषश्रेष्ठ! परलोकमें सत्य जिस प्रकार जीवोंका उद्धार करता है, उस प्रकार यज्ञ, वेदाध्ययन, दान और नियम भी नहीं तार सकते हैं ॥ ६२ ॥

तपांसि यानि चीर्णानि चरिष्यन्ति च यत् तपः । शतैः शतसहस्रैश्च तैः सत्यान्न विशिष्यते ॥ ६३ ॥ लोगोंने अबतक जितनी तपस्याएँ की हैं और भविष्यमें भी जितनी करेंगे, उन सबको सौगुना या लाखगुना करके एकत्र किया जाय तो भी उनका महत्त्व सत्यसे बढ़कर नहीं सिद्ध होगा ॥ ६३ ॥

सत्यमेकाक्षरं ब्रह्म सत्यमेकाक्षरं तपः । सत्यमेकाक्षरो यज्ञः सत्यमेकाक्षरं श्रुतम् ॥ ६४ ॥ सत्य ही एकमात्र अविनाशी ब्रह्म है। सत्य ही एकमात्र अक्षय तप है, सत्य ही एकमात्र अविनाशी यज्ञ है, सत्य ही एकमात्र नाशरहित सनातन वेद है ॥ ६४ ॥

सत्यं वेदेषु जागर्ति फलं सत्ये परं स्मृतम् । सत्याद् धर्मो दमश्चैव सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥ ६५ ॥