भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1274, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1274

वेदोंमें सत्य ही जागता है—उसीकी महिमा बतायी गयी है। सत्यका ही सबसे श्रेष्ठ फल माना गया है। धर्म और इन्द्रिय-संयमकी सिद्धि भी सत्यसे ही होती है। सत्यके ही आधारपर सब कुछ टिका हुआ है ।। ६५ ।। सत्यं वेदास्तथाङ्गानि सत्यं विद्यास्तथा विधिः । व्रतचर्या तथा सत्यमोङ्कारः सत्यमेव च ।। ६६ ।। सत्य ही वेद और वेदांग है। सत्य ही विद्या तथा विधि है। सत्य ही व्रतचर्या तथा सत्य ही ओंकार है ।। ६६ ।। प्राणिनां जननं सत्यं सत्यं संततिरेव च । सत्येन वायुरभ्येति सत्येन तपते रविः ।। ६७ ।। सत्य प्राणियोंको जन्म देनेवाला (पिता) है, सत्य ही संतति है, सत्यसे ही वायु चलती है और सत्यसे ही सूर्य तपता है ।। ६७ ।। सत्येन चाग्निर्दहति स्वर्गः सत्ये प्रतिष्ठितः । सत्यं यज्ञस्तपो वेदाः स्तोभा मन्त्राः सरस्वती ।। ६८ ।। सत्यसे ही आग जलती है तथा सत्यपर ही स्वर्गलोक प्रतिष्ठित है। यज्ञ, तप, वेद, स्तोभ, मन्त्र और सरस्वती—सब सत्यके ही स्वरूप हैं ।। ६८ ।। तुलामारोपितो धर्मः सत्यं चैवेति नः श्रुतम् । समकक्षां तुलयतो यतः सत्यं ततोऽधिकम् ।। ६९ ।। मैंने सुना है कि किसी समय धर्म और सत्यको तराजूपर, जिसके दोनों पलड़े बराबर थे, रखा और तौला गया; उस समय जिस ओर सत्य था, उधरका ही पलड़ा भारी हुआ ।। ६९ ।। यतो धर्मस्ततः सत्यं सर्वं सत्येन वर्धते । किमर्थमनृतं कर्म कर्तुं राजंस्त्वमिच्छसि ।। ७० ।। जहाँ धर्म है वहाँ सत्य है। सत्यसे ही सबकी वृद्धि होती है। राजन्! आप क्यों असत्यपूर्ण बर्ताव करना चाहते हैं? ।। ७० ।। सत्ये कुरु स्थिरं भावं मा राजन्ननृतं कृथाः । कस्मात्त्वमनृतं वाक्यं देहीति कुरुषेऽशुभम् ।। ७१ ।। महाराज! आप सत्यमें ही अपने मनको स्थिर कीजिये। मिथ्यापूर्ण बर्ताव न कीजिये। यदि लेना ही नहीं था तो आपने ‘दीजिये’ यह झूठा और अशुभ वचन क्यों मुँहसे निकाला था ।। ७१ ।। यदि जप्यफलं दत्तं मया नैषिष्यसे नृप । धर्मेभ्यः सम्परिभ्रष्टो लोकाननुचरिष्यसि ।। ७२ ।। नरेश्वर! यदि आप मेरे दिये हुए इस जपके फलको नहीं स्वीकार करेंगे तो धर्मभ्रष्ट होकर सम्पूर्ण लोकोंमें भटकते फिरेंगे ।। ७२ ।।

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