महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1277, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंही मेरे शुभकर्मोंका पूरा-पूरा फल ग्रहण कर लें। मैंने जो कुछ भी धर्म किया है, वह सब आप स्वीकार कर लें॥ ८३॥
भीष्म उवाच
ततो विकृतवेषौ द्वौ पुरुषौ समुपस्थितौ।
गृहीत्वान्योन्यमावेष्ट्य कुचैलावूचतुर्वचः ॥ ८४ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! इसी समय वहाँ विकराल वेषधारी दो पुरुष उपस्थित हुए। दोनोंने एक-दूसरेको पकड़कर अपने हाथोंसे आवेष्टित कर रखा था। दोनोंके शरीरपर मैले वस्त्र थे (उनमेंसे एकका नाम विकृत था और दूसरेका नाम विरूप)। वे दोनों बारंबार इस प्रकार कह रहे थे॥ ८४ ॥
न मे धारयसीत्येको धारयामीति चापरः।
इहास्ति नौ विवादोऽयमयं राजानुशासकः ॥ ८५ ॥
एकने कहा—भाई! तुम्हारे ऊपर मेरा कोई ऋण नहीं है। दूसरा कहता—नहीं, मैं तुम्हारा ऋणी हूँ। पहलेने कहा—यहाँ जो हम दोनोंका विवाद है, इसका निर्णय ये सबका शासन करनेवाले राजा करेंगे॥ ८५ ॥
सत्यं ब्रवीम्यहमिदं न मे धारयते भवान्।
अनृतं वदसीह त्वमृणं ते धारयाम्यहम्॥ ८६ ॥
दूसरा बोला—मैं सच कहता हूँ कि तुमपर मेरा कोई ऋण नहीं है। पहलेने कहा—तुम झूठ बोलते हो। मुझपर तुम्हारा ऋण है॥ ८६ ॥
तावुभौ सुभृशं तप्तौ राजानमिदमूचतुः।
परीक्ष्य त्वं यथा स्यावो नावामिह विगर्हितौ॥ ८७ ॥
तब वे दोनों अत्यन्त संतप्त होकर राजासे इस प्रकार बोले—आप हमारे मामलेकी जाँच-पड़ताल करके फैसला कर दें, जिससे हम दोनों यहाँ दोषके भागी और निन्दाके पात्र न हों॥ ८७ ॥
विरूप उवाच
धारयामि नरव्याघ्र विकृतस्येह गोः फलम्।
ददतश्च न गृह्णाति विकृतो मे महीपते॥ ८८ ॥
विरूप बोला—पुरुषसिंह! मैं विकृतके एक गोदानका फल ऋणके तौरपर अपने यहाँ रखता हूँ। पृथ्वीनाथ! उस ऋणको आज मैं दे रहा हूँ; परंतु यह विकृत ले नहीं रहा है॥ ८८ ॥
विकृत उवाच
न मे धारयते किञ्चिद् विरूपोऽयं नराधिप।