भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1278, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1278

मिथ्या ब्रवीत्ययं हि त्वां सत्याभासं नराधिप ॥ ८९ ॥ **विकृतने कहा—**नरेश्वर! इस विरूपपर मेरा कोई ऋण नहीं है। यह आपसे झूठ बोलता है। इसकी बातमें सत्यका आभासमात्र है ॥ ८९ ॥

राजोवाच

विरूप किं धारयते भवानस्य ब्रवीतु मे । श्रुत्वा तथा करिष्येऽहमिति मे धीयते मनः ॥ ९० ॥ **राजा बोले—**विरूप! तुम्हारे ऊपर विकृतका कौन-सा ऋण है। बताओ, मैं उसे सुनकर कोई निर्णय करूँगा। मेरे मनका ऐसा ही निश्चय है ॥ ९० ॥

विरूप उवाच

शृणुष्वावहितो राजन् यथैतद् धारयाम्यहम् । विकृतस्यास्य राजर्षे निखिलेन नराधिप ॥ ९१ ॥ **विरूप बोला—**राजन्! नरेश्वर! आप सावधान होकर सुनें, राजर्षे! इस विकृतका ऋण जिस प्रकार मैं धारण करता हूँ, वह सब पूर्णरूपसे बता रहा हूँ ॥ ९१ ॥ अनेन धर्मप्राप्त्यर्थं शुभा दत्ता पुरानघ । धेनुर्विप्राय राजर्षे तपःस्वाध्यायशीलिने ॥ ९२ ॥ निष्पाप राजर्षे! इसने धर्मकी प्राप्तिके लिये एक तपस्वी और स्वाध्यायशील ब्राह्मणको एक दूध देनेवाली उत्तम गाय दी थी ॥ ९२ ॥ तस्याश्चायं मया राजन् फलमभ्येत्य याचितः । विकृतेन च मे दत्तं विशुद्धेनान्तरात्मना ॥ ९३ ॥ राजन्! मैंने इसके घर जाकर इससे उसी गोदानका फल माँगा था और विकृतने शुद्ध हृदयसे मुझे वह दे दिया था ॥ ९३ ॥ ततो मे सुकृतं कर्म कृतमात्मविशुद्धये । गावौ च कपिले क्रीत्वा वत्सले बहुदोहने ॥ ९४ ॥ ते चोञ्छवृत्तये राजन् मया समपवर्जिते । यथाविधि यथाश्रद्धं तदस्याहं पुनः प्रभो ॥ ९५ ॥ तदनन्तर मैंने भी अपनी शुद्धिके लिये पुण्यकर्म किया। राजन्! दो अधिक दूध देनेवाली कपिला गौएँ, जिनके साथ उनके बछड़े भी थे, खरीदकर उन्हें मैंने एक उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणको विधि और श्रद्धा-पूर्वक दे दिया। प्रभो! उसी गोदानका फल मैं पुनः इसे वापस करना चाहता हूँ ॥ ९४-९५ ॥ इहाद्यैव गृहीत्वा तु प्रयच्छे द्विगुणं फलम् । एवं स्यात् पुरुषव्याघ्र कः शुद्धः कोऽत्र दोषवान् ॥ ९६ ॥