महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1327, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाबाहु युधिष्ठिर! जगत्में शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले श्रीकृष्णके जिन माहात्म्योंको ब्राह्मणलोग जानते हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो ॥ ६ ॥ यानि चाहर्मनुष्येन्द्र ये पुराणविदो जनाः । कर्माणि त्विह गोविन्दे कीर्तयिष्यामि तान्यहम् ॥ ७ ॥ नरेन्द्र! पुराणवेत्ता पुरुष गोविन्दकी जिन-जिन लीलाओं तथा चरित्रोंका वर्णन करते हैं, उनका मैं यहाँ वर्णन करूँगा ॥ ७ ॥ महाभूतानि भूतात्मा महात्मा पुरुषोत्तमः । वायुर्ज्योतिस्तथा चापः खं च गां चान्वकल्पयत् ॥ ८ ॥ सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा महात्मा पुरुषोत्तमने आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी— इन पाँच महाभूतोंकी रचना की है ॥ ८ ॥ स सृष्ट्वा पृथिवीं चैव सर्वभूतेश्वरः प्रभुः । अप्स्वेव भवनं चक्रे महात्मा पुरुषोत्तमः ॥ ९ ॥ सर्वभूतेश्वर, प्रभु, महात्मा पुरुषोत्तमने इस पृथ्वीकी सृष्टि करके जलमें ही अपना निवासस्थान बनाया ॥ ९ ॥ सर्वतेजोमयस्तस्मिन् शयानः पुरुषोत्तमः । सोऽग्रजं सर्वभूतानां संकर्षणमकल्पयत् ॥ १० ॥ आश्रयं सर्वभूतानां मनसेतीह शुश्रुम । उसमें शयन करते हुए सर्वतेजोमय पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने मनसे ही सम्पूर्ण प्राणियोंके अग्रज तथा आश्रय संकर्षणको उत्पन्न किया, यह हमने सुना है ॥ स धारयति भूतानि उभे भूतभविष्यती ॥ ११ ॥ ततस्तस्मिन् महाबाहौ प्रादुर्भूते महात्मनि । भास्करप्रतिमं दिव्यं नाभ्यां पद्ममजायत ॥ १२ ॥ वे संकर्षण ही समस्त भूतोंको धारण करते हैं तथा वे ही भूत और भविष्यके भी आधार हैं। उन महाबाहु महात्मा संकर्षणका प्रादुर्भाव होनेके पश्चात् श्रीहरिकी नाभिसे एक दिव्य कमल प्रकट हुआ, जो सूर्यके समान प्रकाशमान था ॥ ११-१२ ॥ स तत्र भगवान् देवः पुष्करे भ्राजयन् दिशः । ब्रह्मा समभवत् तात सर्वभूतपितामहः ॥ १३ ॥ तात! उस कमलसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए समस्त प्राणियोंके पितामह देवस्वरूप भगवान् ब्रह्मा उत्पन्न हुए ॥ १३ ॥ तस्मिन्नपि महाबाहौ प्रादुर्भूते महात्मनि । तमसा पूर्वजो जज्ञे मधुर्नाम महासुरः ॥ १४ ॥ उन महाबाहु महात्मा ब्रह्माजीकी भी उत्पत्ति हो जानेपर वहाँ तमोगुणसे मधुनामक महान् असुर प्रकट हुआ, जो असुरोंका पूर्वज था ॥ १४ ॥