महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1335, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंइन भगवान् गोविन्दकी आराधना करके कितने ही महर्षि मुक्तिको प्राप्त हो गये हैं। ये ही जगत्के सृष्टिकर्ता, संहारकर्ता और समस्त कारणोंके भी कारण हैं॥ मयाप्येतच्छ्रुतं राजन् नारदात्तु निबोध तत्। स्वयमेव समाचष्ट नारदो भगवान् मुनिः॥ राजन्! मैंने भी यह बात नारदजीसे ही सुनी है। तुम भी उनके मुखसे सुन सकते हो। भगवान् नारदमुनिने स्वयं ही यह बात मुझसे कही थी॥ समस्तसंसारविघातकारणं भजन्ति ये विष्णुमनन्यमानसाः। ते यान्ति सायुज्यमतीव दुर्लभं इतीव नित्यं हृदि वर्णयन्ति॥) जो समस्त संसार-बन्धनकी निवृत्तिके कारणभूत भगवान् विष्णुकी अनन्य चित्तसे आराधना करते हैं, वे अत्यन्त दुर्लभ सायुज्य मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। यह बात सदा मेरे हृदयमें बनी रहती है तथा ऋषिलोग भी इसका वर्णन करते हैं॥ देवं देवर्षिराचष्ट नारदः सर्वलोकदृक् ॥ ४७ ॥ सम्पूर्ण जगत्को देखनेवाले देवर्षि नारदने भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन किया था ॥ ४७ ॥ नारदोऽप्यथ कृष्णस्य परं मेने नराधिप। शाश्वतत्वं महाबाहो यथावद् भरतर्षभ ॥ ४८ ॥ महाबाहु भरतश्रेष्ठ नरेश्वर! नारदजीने श्रीकृष्णके परम सनातन परमात्मभावको यथावत्रूपसे जाना और माना है॥ एवमेष महाबाहुः केशवः सत्यविक्रमः। अचिन्त्यः पुण्डरीकाक्षो नैष केवलमानुषः॥ ४९ ॥ युधिष्ठिर! इस प्रकार ये सत्यपराक्रमी कमलनयन महाबाहु केशव अचिन्त्य परमेश्वर हैं। इन्हें केवल मनुष्य नहीं मानना चाहिये ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि सर्वभूतोत्पत्तिकथने सप्ताधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०७॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें श्रीकृष्णसे सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिविषयक दो सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २०७॥
* पुरुष (श्रीकृष्ण) ही यह सब कुछ हैं।