महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1334, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंभद्रमस्तु ऋषे तुभ्यं वरं वरय सुव्रत । यत्ते मनसि सुव्यक्तमस्ति च प्रददामि तत् ॥ श्रीभगवान् बोले— उत्तम व्रतका पालन करनेवाले देवर्षे! तुम्हारा कल्याण हो। तुम कोई वर माँगो। तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हुई हो, उसे स्पष्ट बताओ। मैं उसे पूर्ण करूँगा॥
भीष्म उवाच
स चेमं जयशब्देन प्रसीदेत्यातुरो मुनिः । प्रोवाच हृदि संरूढं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ विवक्षितं जगन्नाथ मया ज्ञातं त्वयाच्युत । तत् प्रसीद हृषीकेश श्रोतुमिच्छामि तद्धरे ॥ भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! प्रेमसे आतुर हुए मुनिवर नारदने जय-जयकार करते हुए अपने हृदयमें नित्य विराजमान रहनेवाले शंख, चक्र और गदाधारी भगवान्से कहा—‘प्रभो! प्रसन्न होइये। जगन्नाथ! अच्युत! हृषीकेश! हरे! मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ, वह आपको पहलेसे ही ज्ञात है। मैं उसीको सुनना चाहता हूँ। आप मुझपर कृपा करें’॥
ततः स्मयन् महाविष्णुरभ्यभाषत नारदम् । निर्द्वन्द्वा निरहङ्काराः शुचयः शुद्धलोचनाः ॥ ते मां पश्यन्ति सततं तान् पृच्छ यदिहेच्छसि । तब मुसकराते हुए भगवान् महाविष्णुने नारदजीसे कहा—‘जो लोग शीत, उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे रहित, अहंकारशून्य, पवित्र तथा निर्दोष दृष्टिवाले महात्मा हैं वे निरन्तर मेरे उस स्वरूपका साक्षात्कार करते हैं; अतः तुम यहाँ जो कुछ चाहते हो, उसके विषयमें उन्हीं महात्माओंके पास जाकर प्रश्न करो।।
ये योगिनो महाप्राज्ञा मदंशा ये व्यवस्थिताः । तेषां प्रसादं देवर्षे मत्प्रसादमवैहि तत् ॥ ‘देवर्षे! जो लोग योगी और महाज्ञानी हैं; तथा जो मेरे अंशरूपसे स्थित हैं, उनके प्रसादको तुम मेरा ही कृपाप्रसाद समझो’॥
इत्युक्त्वा स जगामाथ भगवान् भूतभावनः । तस्माद् व्रज हृषीकेशं कृष्णं देवकिनन्दनम् ॥ ऐसा कहकर भूतभावन भगवान् विष्णु वहाँसे चले गये; अतः युधिष्ठिर! तुम भी सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् देवकीनन्दन श्रीकृष्णकी शरणमें जाओ ।।
एतमाराध्य गोविन्दं गता मुक्तिं महर्षयः । एष कर्ता विकर्ता च सर्वकारणकारणम् ॥