महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1333, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रादुश्चकार विश्वात्मा ऋषेः परमसौहृदात् ।।
तदनन्तर सौ वर्ष पूर्ण होनेपर लोकस्रष्टा विश्वात्मा भगवान् श्रीहरि ऋषिके प्रति परम सौहार्दवश उनके सामने प्रकट हुए ।।
तमागतं जगन्नाथं सर्वकारणकारणम् ।
अखिलामरमौल्यङ्गरुकमारुणपदद्वयम् ।।
वैनतेयपदस्पर्शकिणशोभितजानुकम् ।
पीताम्बरलसत्काञ्चीदामबद्धकटीतटम् ।।
श्रीवत्सवक्षसं चारुमणिकौस्तुभकन्धरम् ।
मन्दस्मितमुखाम्भोजं चलदायतलोचनम् ।।
नम्रचापानुकरणनम्रभ्रूयुगशोभितम् ।
नानारत्नमणिवज्रस्फुरन्मकरकुण्डलम् ।।
इन्द्रनीलनिभाभं तं केयूरमुकुटोज्ज्वलम् ।
देवैरिन्द्रपुरोगैश्च ऋषिषङ्घैरभिष्टुतम् ।।
नारदो जयशब्देन ववन्दे शिरसा हरिम् ।
नारदजीने देखा, समस्त कारणोंके भी कारण भगवान् जगन्नाथ पधारे हैं। उनके युगल चरणारविन्द सम्पूर्ण देवताओंके सुवर्णमय मुकुटोंके कुंकुमसे रक्तवर्ण हो रहे हैं। गरुड़जीके ऊपर सवारी करनेसे उनके दोनों घुटनोंमें रगड़ पड़नेके कारण चिह्न बन गये हैं; जो उन घुटनोंकी शोभा बढ़ा रहे हैं। उनके श्यामसुन्दर अंगपर पीताम्बर शोभा पा रहा है और कटिप्रदेशमें किंकिणीकी लड़ें बँधी हुई हैं। वक्षःस्थलमें श्रीवत्सकी सुनहरी रेखा शोभा पाती है। गलेमें मनोहर कौस्तुभमणि अपना प्रकाश बिखेर रही है। मुखारविन्दपर मन्द-मन्द मुसकानकी मनोहर घटा छा रही है। विशाल नेत्र चंचल गतिसे इधर-उधर देख रहे हैं। झुके हुए दो धनुषोंकी भाँति बाँकी भौंहें उनके मुखमण्डलकी शोभा बढ़ा रही हैं। नाना प्रकारके रत्न, मणि और हीरोंसे जटिल मकराकार कुण्डल जगमगा रहे हैं। उनकी अंगकान्ति इन्द्रनीलमणिके समान श्याम है। बाँहोंमें केयूर तथा मस्तकपर मुकुटकी उज्ज्वल आभा छिटक रही है एवं इन्द्र आदि देवता और महर्षियोंके समुदाय उनकी स्तुति करते हैं। भगवान्की यह झाँकी देखकर जय-जयकार करते हुए नारदजीने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया ।।
ततः स भगवान् श्रीमान् मेघगम्भीरया गिरः ।
प्राहेशः सर्वभूतानां नारदं पतितं क्षितौ ।।
तदनन्तर नारदजीको पृथ्वीपर पड़ा देख सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी श्रीमान् भगवान् नारायणने मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा ।।
श्रीभगवानुवाच