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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

प्रादुश्चकार विश्वात्मा ऋषेः परमसौहृदात् ।।
तदनन्तर सौ वर्ष पूर्ण होनेपर लोकस्रष्टा विश्वात्मा भगवान् श्रीहरि ऋषिके प्रति परम सौहार्दवश उनके सामने प्रकट हुए ।।

तमागतं जगन्नाथं सर्वकारणकारणम् ।
अखिलामरमौल्यङ्गरुकमारुणपदद्वयम् ।।
वैनतेयपदस्पर्शकिणशोभितजानुकम् ।
पीताम्बरलसत्काञ्चीदामबद्धकटीतटम् ।।
श्रीवत्सवक्षसं चारुमणिकौस्तुभकन्धरम् ।
मन्दस्मितमुखाम्भोजं चलदायतलोचनम् ।।
नम्रचापानुकरणनम्रभ्रूयुगशोभितम् ।
नानारत्नमणिवज्रस्फुरन्मकरकुण्डलम् ।।
इन्द्रनीलनिभाभं तं केयूरमुकुटोज्ज्वलम् ।
देवैरिन्द्रपुरोगैश्च ऋषिषङ्घैरभिष्टुतम् ।।
नारदो जयशब्देन ववन्दे शिरसा हरिम् ।

नारदजीने देखा, समस्त कारणोंके भी कारण भगवान् जगन्नाथ पधारे हैं। उनके युगल चरणारविन्द सम्पूर्ण देवताओंके सुवर्णमय मुकुटोंके कुंकुमसे रक्तवर्ण हो रहे हैं। गरुड़जीके ऊपर सवारी करनेसे उनके दोनों घुटनोंमें रगड़ पड़नेके कारण चिह्न बन गये हैं; जो उन घुटनोंकी शोभा बढ़ा रहे हैं। उनके श्यामसुन्दर अंगपर पीताम्बर शोभा पा रहा है और कटिप्रदेशमें किंकिणीकी लड़ें बँधी हुई हैं। वक्षःस्थलमें श्रीवत्सकी सुनहरी रेखा शोभा पाती है। गलेमें मनोहर कौस्तुभमणि अपना प्रकाश बिखेर रही है। मुखारविन्दपर मन्द-मन्द मुसकानकी मनोहर घटा छा रही है। विशाल नेत्र चंचल गतिसे इधर-उधर देख रहे हैं। झुके हुए दो धनुषोंकी भाँति बाँकी भौंहें उनके मुखमण्डलकी शोभा बढ़ा रही हैं। नाना प्रकारके रत्न, मणि और हीरोंसे जटिल मकराकार कुण्डल जगमगा रहे हैं। उनकी अंगकान्ति इन्द्रनीलमणिके समान श्याम है। बाँहोंमें केयूर तथा मस्तकपर मुकुटकी उज्ज्वल आभा छिटक रही है एवं इन्द्र आदि देवता और महर्षियोंके समुदाय उनकी स्तुति करते हैं। भगवान्‌की यह झाँकी देखकर जय-जयकार करते हुए नारदजीने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया ।।

ततः स भगवान् श्रीमान् मेघगम्भीरया गिरः ।
प्राहेशः सर्वभूतानां नारदं पतितं क्षितौ ।।

तदनन्तर नारदजीको पृथ्वीपर पड़ा देख सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी श्रीमान् भगवान् नारायणने मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा ।।

श्रीभगवानुवाच

भद्रमस्तु ऋषे तुभ्यं वरं वरय सुव्रत । यत्ते मनसि सुव्यक्तमस्ति च प्रददामि तत् ॥ श्रीभगवान् बोले— उत्तम व्रतका पालन करनेवाले देवर्षे! तुम्हारा कल्याण हो। तुम कोई वर माँगो। तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हुई हो, उसे स्पष्ट बताओ। मैं उसे पूर्ण करूँगा॥

भीष्म उवाच

स चेमं जयशब्देन प्रसीदेत्यातुरो मुनिः । प्रोवाच हृदि संरूढं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ विवक्षितं जगन्नाथ मया ज्ञातं त्वयाच्युत । तत् प्रसीद हृषीकेश श्रोतुमिच्छामि तद्धरे ॥ भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! प्रेमसे आतुर हुए मुनिवर नारदने जय-जयकार करते हुए अपने हृदयमें नित्य विराजमान रहनेवाले शंख, चक्र और गदाधारी भगवान्‌से कहा—‘प्रभो! प्रसन्न होइये। जगन्नाथ! अच्युत! हृषीकेश! हरे! मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ, वह आपको पहलेसे ही ज्ञात है। मैं उसीको सुनना चाहता हूँ। आप मुझपर कृपा करें’॥

ततः स्मयन् महाविष्णुरभ्यभाषत नारदम् । निर्द्वन्द्वा निरहङ्काराः शुचयः शुद्धलोचनाः ॥ ते मां पश्यन्ति सततं तान् पृच्छ यदिहेच्छसि । तब मुसकराते हुए भगवान् महाविष्णुने नारदजीसे कहा—‘जो लोग शीत, उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे रहित, अहंकारशून्य, पवित्र तथा निर्दोष दृष्टिवाले महात्मा हैं वे निरन्तर मेरे उस स्वरूपका साक्षात्कार करते हैं; अतः तुम यहाँ जो कुछ चाहते हो, उसके विषयमें उन्हीं महात्माओंके पास जाकर प्रश्न करो।।

ये योगिनो महाप्राज्ञा मदंशा ये व्यवस्थिताः । तेषां प्रसादं देवर्षे मत्प्रसादमवैहि तत् ॥ ‘देवर्षे! जो लोग योगी और महाज्ञानी हैं; तथा जो मेरे अंशरूपसे स्थित हैं, उनके प्रसादको तुम मेरा ही कृपाप्रसाद समझो’॥

इत्युक्त्वा स जगामाथ भगवान् भूतभावनः । तस्माद् व्रज हृषीकेशं कृष्णं देवकिनन्दनम् ॥ ऐसा कहकर भूतभावन भगवान् विष्णु वहाँसे चले गये; अतः युधिष्ठिर! तुम भी सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् देवकीनन्दन श्रीकृष्णकी शरणमें जाओ ।।

एतमाराध्य गोविन्दं गता मुक्तिं महर्षयः । एष कर्ता विकर्ता च सर्वकारणकारणम् ॥

इन भगवान् गोविन्दकी आराधना करके कितने ही महर्षि मुक्तिको प्राप्त हो गये हैं। ये ही जगत्के सृष्टिकर्ता, संहारकर्ता और समस्त कारणोंके भी कारण हैं॥ मयाप्येतच्छ्रुतं राजन् नारदात्तु निबोध तत्। स्वयमेव समाचष्ट नारदो भगवान् मुनिः॥ राजन्! मैंने भी यह बात नारदजीसे ही सुनी है। तुम भी उनके मुखसे सुन सकते हो। भगवान् नारदमुनिने स्वयं ही यह बात मुझसे कही थी॥ समस्तसंसारविघातकारणं भजन्ति ये विष्णुमनन्यमानसाः। ते यान्ति सायुज्यमतीव दुर्लभं इतीव नित्यं हृदि वर्णयन्ति॥) जो समस्त संसार-बन्धनकी निवृत्तिके कारणभूत भगवान् विष्णुकी अनन्य चित्तसे आराधना करते हैं, वे अत्यन्त दुर्लभ सायुज्य मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। यह बात सदा मेरे हृदयमें बनी रहती है तथा ऋषिलोग भी इसका वर्णन करते हैं॥ देवं देवर्षिराचष्ट नारदः सर्वलोकदृक् ॥ ४७ ॥ सम्पूर्ण जगत्को देखनेवाले देवर्षि नारदने भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन किया था ॥ ४७ ॥ नारदोऽप्यथ कृष्णस्य परं मेने नराधिप। शाश्वतत्वं महाबाहो यथावद् भरतर्षभ ॥ ४८ ॥ महाबाहु भरतश्रेष्ठ नरेश्वर! नारदजीने श्रीकृष्णके परम सनातन परमात्मभावको यथावत्रूपसे जाना और माना है॥ एवमेष महाबाहुः केशवः सत्यविक्रमः। अचिन्त्यः पुण्डरीकाक्षो नैष केवलमानुषः॥ ४९ ॥ युधिष्ठिर! इस प्रकार ये सत्यपराक्रमी कमलनयन महाबाहु केशव अचिन्त्य परमेश्वर हैं। इन्हें केवल मनुष्य नहीं मानना चाहिये ॥ ४९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि सर्वभूतोत्पत्तिकथने सप्ताधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०७॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें श्रीकृष्णसे सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिविषयक दो सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २०७॥


* पुरुष (श्रीकृष्ण) ही यह सब कुछ हैं।

ब्रह्माके पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियोंके वंशका तथा प्रत्येक दिशामें निवास करनेवाले महर्षियोंका वर्णन

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अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः

ब्रह्माके पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियोंके वंशका तथा प्रत्येक दिशामें निवास करनेवाले महर्षियोंका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

के पूर्वमासन् पतयः प्रजानां भरतर्षभ ।
के चर्षयो महाभागा दिक्षु प्रत्येकशः स्मृताः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! पूर्वकालमें कौन-कौन-से लोग प्रजापति थे और प्रत्येक दिशामें किन-किन महाभाग महर्षियोंकी स्थिति मानी गयी है ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

श्रूयतां भरतश्रेष्ठ यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
प्रजानां पतयो येऽस्मिन् दिक्षु ये चर्षयः स्मृताः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— भरतश्रेष्ठ! इस जगत्में जो प्रजापति रहे हैं तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें जिन-जिन ऋषियोंकी स्थिति मानी गयी है, उन सबको जिनके विषयमें तुम मुझसे पूछते हो; मैं बताता हूँ, सुनो ॥ २ ॥

एकः स्वयम्भूर्भगवानाद्यो ब्रह्मा सनातनः ।
ब्रह्मणः सप्त वै पुत्रा महात्मानः स्वयम्भुवः ॥ ३ ॥
एकमात्र सनातन भगवान् स्वयम्भू ब्रह्मा सबके आदि हैं। स्वयम्भू ब्रह्माके सात महात्मा पुत्र बताये गये हैं ॥ ३ ॥

मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
वसिष्ठश्च महाभागः सदृशो वै स्वयम्भुवा ॥ ४ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु तथा महाभाग वसिष्ठ। ये सभी स्वयम्भू ब्रह्माके समान ही शक्तिशाली हैं ॥ ४ ॥

सप्तब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि सर्वानैव प्रजापतीन् ॥ ५ ॥
पुराणमें ये सात ब्रह्मा निश्चित किये गये हैं। अब मैं समस्त प्रजापतियोंका वर्णन आरम्भ करता हूँ ॥ ५ ॥

अत्रिवंशसमुत्पन्नो ब्रह्मयोनिः सनातनः ।
प्राचीनबर्हिर्भगवान्स्तस्मात् प्राचेतसो दश ॥ ६ ॥
अत्रिकुलमें उत्पन्न जो सनातन ब्रह्मयोनि भगवान् प्राचीनबर्हि हैं, उनसे प्राचेतस नामवाले दस प्रजापति उत्पन्न हुए ॥ ६ ॥

दशानां तनयस्त्वेको दक्षो नाम प्रजापतिः । तस्य द्वे नामनी लोके दक्षः क इति चोच्यते ॥ ७ ॥ उन दसोंके एकमात्र पुत्र दक्ष नामसे प्रसिद्ध प्रजापति हैं। उनके दो नाम बताये जाते हैं—‘दक्ष’ और ‘क’ ॥ ७ ॥

मरीचेः कश्यपः पुत्रस्तस्य द्वे नामनी स्मृते । अरिष्टनेमिरित्येके कश्यपेत्यपरे विदुः ॥ ८ ॥ मरीचिके पुत्र जो कश्यप हैं, उनके भी दो नाम माने गये हैं। कुछ लोग उन्हें अरिष्टनेमि कहते हैं और दूसरे लोग उन्हें कश्यपके नामसे जानते हैं ॥ ८ ॥

अत्रेश्चैवौरसः श्रीमान् राजा सोमश्च वीर्यवान् । सहस्रं यश्च दिव्यानां युगानां पर्युपासिता ॥ ९ ॥ अत्रिके औरस पुत्र श्रीमान् और बलवान् राजा सोम हुए, जिन्होंने सहस्र दिव्य युगोंतक भगवान्‌की उपासना की थी ॥ ९ ॥

अर्यमा चैव भगवान् ये चास्य तनया विभो । एते प्रदेशाः कथिता भुवनानां प्रभावनाः ॥ १० ॥ प्रभो! भगवान् अर्यमा और उनके सभी पुत्र—ये प्रदेश (आदेश देनेवाले शासक) तथा प्रभावन (उत्तम स्रष्टा) कहे गये हैं ॥ १० ॥

शशबिन्दोश्च भार्याणां सहस्राणि दशाच्युत । एकैकस्यां सहस्रं तु तनयानामभूत् तदा ॥ ११ ॥ एवं शतसहस्राणां शतं तस्य महात्मनः । पुत्राणां च न ते कंचिदिच्छन्त्यन्यं प्रजापतिम् ॥ १२ ॥ धर्मसे विचलित न होनेवाले युधिष्ठिर! शशबिन्दुके दस हजार स्त्रियाँ थीं। उनमेंसे प्रत्येकके गर्भसे एक-एक हजार पुत्र उत्पन्न हुए। इस प्रकार उन महात्माके एक करोड़ पुत्र थे। वे उनके सिवा किसी दूसरे प्रजापतिकी इच्छा नहीं करते थे ॥ ११-१२ ॥

प्रजामाचक्षते विप्राः पुराणाः शाशबिन्दवीम् । स वृष्णिवंशप्रभवो महावंशः प्रजापतेः ॥ १३ ॥ प्राचीनकालके ब्राह्मण अधिकांश प्रजाकी उत्पत्ति शशबिन्दुसे ही बताते हैं। प्रजापतिका वह महान् वंश ही वृष्णिवंशका उत्पादक हुआ ॥ १३ ॥

एते प्रजानां पतयः समुद्दिष्टा यशस्विनः । अतः परं प्रवक्ष्यामि देवांस्त्रिभुवनेश्वरान् ॥ १४ ॥ युधिष्ठिर! ये सब यशस्वी प्रजापति बताये गये हैं। अब मैं तीनों लोकोंपर शासन करनेवाले देवताओंका परिचय दूँगा ॥ १४ ॥

भगोंऽशश्चार्यमा चैव मित्रोऽथ वरुणस्तथा । सविता चैव धाता च विवस्वांश्च महाबलः ॥ १५ ॥

त्वष्टा पूषा तथैवेन्द्रो द्वादशो विष्णुरुच्यते । इत्येते द्वादशादित्याः कश्यपस्यात्मसम्भवाः ॥ १६ ॥ भग, अंश, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता, महाबली विवस्वान्, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र और बारहवें विष्णु कहे गये हैं। ये बारह आदित्य हैं, जो कश्यप और अदितिके पुत्र हैं ॥ १५-१६ ॥

नासत्यश्चैव दस्रश्च स्मृतौ द्वावश्विनावपि । मार्तण्डस्यात्मजावेतावष्टमस्य महात्मनः ॥ १७ ॥ नासत्य और दस्र—ये दोनों अश्विनीकुमार बताये गये हैं। ये दोनों अष्टम आदित्य महात्मा सूर्यके पुत्र हैं ॥

ते च पूर्वं सुराश्चेति द्विविधाः पितरः स्मृताः । त्वष्टुश्चैवात्मजः श्रीमान् विश्वरूपो महायशाः ॥ १८ ॥ ये तथा पूर्वोक्त देवता—दो प्रकारके पितर माने गये हैं। त्वष्टाके पुत्र महायशस्वी श्रीमान् विश्वरूप हुए ॥

अजैकपादहिर्बुध्न्यो विरूपाक्षोऽथ रैवतः । हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्च सुरेश्वरः ॥ १९ ॥ सावित्रश्च जयन्तश्च पिनाकी चापराजितः । पूर्वमेव महाभागा वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ २० ॥ अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, सुरेश्वर, सावित्र, जयन्त, पिनाकी और अपराजित—ये ग्यारह रुद्र हैं। महाभाग आठ वसुओंके नाम पहले ही बताये गये हैं ॥ १९-२० ॥

एत एवंविधा देवा मनोरेव प्रजापतेः । ते च पूर्वं सुराश्चेति द्विविधाः पितरः स्मृताः ॥ २१ ॥ इस प्रकार ये देवता प्रजापति मनुकी ही संतान हैं। वे तथा पूर्वोक्त देवता—ये दो प्रकारके पितर माने गये हैं ॥ २१ ॥

शीलयौवनतस्त्वन्यस्तथान्यः सिद्धसाध्ययोः । ऋभवो मरुतश्चैव देवानां चोदितो गणः ॥ २२ ॥ देवताओंमें एक वर्ग ऐसा है, जो सुन्दर शील-स्वभाव और अक्षय यौवनसे सम्पन्न है। दूसरा वर्ग सिद्धों और साध्योंका है। ऋभु और मरुत्—ये देवताओंके समुदायोंके नाम हैं ॥ २२ ॥

एवमेते समाम्नाता विश्वेदेवास्तथाश्विनौ । आदित्याः क्षत्रियास्तेषां विशश्च मरुतस्तथा ॥ २३ ॥ इसी प्रकार ये विश्वेदेव और अश्विनीकुमार भी देवताओंके गण माने गये हैं। इन देवताओंमें आदित्यगण क्षत्रिय और मरुद्गण वैश्य माने जाते हैं ॥ २३ ॥

अश्विनौ तु स्मृतौ शूद्रौ तपस्युग्रे समास्थितौ । स्मृतास्त्वङ्गिरसो देवा ब्राह्मणा इति निश्चयः ॥ २४ ॥ उग्र तपस्यामें लगे हुए दोनों अश्विनीकुमारोंको शूद्र कहा जाता है। अंगिरा गोत्रवाले सम्पूर्ण देवता ब्राह्मण माने गये हैं। यही विद्वानोंका निश्चय है ॥ २४ ॥

इत्येतत् सर्वदेवानां चातुर्वर्ण्यं प्रकीर्तितम् । एतान् वै प्रातरुत्थाय देवान् यस्तु प्रकीर्तयेत् ॥ २५ ॥ स्वजादन्यकृताच्चैव सर्वपापात् प्रमुच्यते । इस प्रकार सम्पूर्ण देवताओंमें जो चार वर्ण हैं, उनका वर्णन किया गया। जो सबेरे उठकर इन देवताओंका कीर्तन करता है, वह स्वयं किये हुए तथा दूसरोंके संसर्गसे प्राप्त हुए सम्पूर्ण पापसमूहसे मुक्त हो जाता है ॥ २५ १/२ ॥

यवक्रीतोऽथ रैभ्यश्च अर्वावसुपरावसू ॥ २६ ॥ औशिजश्चैव कक्षीवान् बलश्चाङ्गिरसः सुताः । यवक्रीत, रैभ्य, अर्वावसु, परावसु, औशिज, कक्षीवान् और बल—ये अंगिराके पुत्र हैं ॥ २६ १/२ ॥

ऋषिर्मेधातिथेः पुत्रः कण्वो बर्हिषदस्तथा ॥ २७ ॥ त्रैलोक्यभावनास्तात् प्राच्यां सप्तर्षयस्तथा । तात! मेधातिथिके पुत्र कण्वमुनि, बर्हिषद तथा त्रिलोकीको उत्पन्न करनेमें समर्थ सप्तर्षिगण हैं, जो पूर्व दिशामें स्थित होते हैं ॥ २७ १/२ ॥

उन्मुचो विमुचश्चैव स्वस्त्यात्रेयश्च वीर्यवान् ॥ २८ ॥ प्रमुचश्चेध्मवाहश्च भगवांश्च दृढव्रतः । मित्रावरुणयोः पुत्रस्तथागस्त्यः प्रतापवान् ॥ २९ ॥ एते ब्रह्मर्षयो नित्यमास्थिता दक्षिणां दिशम् । उन्मुच, विमुच, बलवान् स्वस्त्यात्रेय, प्रमुच, इध्मवाह, दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मित्रावरुणके प्रतापी पुत्र भगवान् अगस्त्य—ये ब्रह्मर्षि सदा दक्षिण दिशामें रहते हैं ॥ २८-२९ १/२ ॥

उषङ्गुः कवषो धौम्यः परिव्याधश्च वीर्यवान् ॥ ३० ॥ एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चैव महर्षयः । अत्रेः पुत्रश्च भगवांस्तथा सारस्वतः प्रभुः ॥ ३१ ॥ एते चैव महात्मानः पश्चिमामाश्रिता दिशम् । उषंगु, कवष, धौम्य, शक्तिशाली परिव्याध, एकत, द्वित, त्रित तथा अत्रिके प्रभावशाली पुत्र भगवान् सारस्वत—ये महात्मा महर्षि पश्चिम दिशामें निवास करते हैं ॥ ३०-३१ १/२ ॥

आत्रेयश्च वसिष्ठश्च कश्यपश्च महानृषिः ॥ ३२ ॥

गौतमोऽथ भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ कौशिकः ।
तथैव पुत्रो भगवानृचीकस्य महात्मनः ॥ ३३ ॥
जमदग्निश्च सप्तैते उदीचीमाश्रिता दिशम् ।
आत्रेय, वसिष्ठ, महर्षि कश्यप, गौतम, भरद्वाज, कुशिकवंशी विश्वामित्र तथा महात्मा ऋचीकके पुत्र भगवान् जमदग्नि—ये सात उत्तर दिशामें रहते हैं ॥
एते प्रतिदिशं सर्वे कीर्तितास्तिग्मतेजसः ॥ ३४ ॥
साक्षिभूता महात्मानो भुवनानां प्रभावनाः ।
एवमेते महात्मानः स्थिताः प्रत्येकशो दिशम् ॥ ३५ ॥
इस प्रकार प्रत्येक दिशामें रहनेवाले सम्पूर्ण तेजस्वी महर्षियोंका वर्णन किया गया। ये महात्मा सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि करनेमें समर्थ एवं सबके साक्षी हैं। इनका हृदय बड़ा विशाल है। इस तरह ये प्रत्येक दिशामें निवास करते हैं ॥ ३४-३५ ॥
एतेषां कीर्तनं कृत्वा सर्वपापात् प्रमुच्यते ।
यस्यां यस्यां दिशि ह्येते तां दिशं शरणं गतः ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यः स्वस्तिमांश्च गृहान् व्रजेत् ॥ ३६ ॥
इन सबका गुणगान करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। जिस-जिस दिशामें ये महर्षि रहते हैं, उस-उस दिशामें जानेपर जो मनुष्य इनकी शरण लेता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और कुशलपूर्वक अपने घरको पहुँच जाता है ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि दिशास्वस्तिकं नाम
अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें दिशास्वस्तिक नामक दो सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०८ ॥

युधिष्ठिरने पूछा—युद्धमें सच्चा पराक्रम प्रकट करनेवाले महाप्राज्ञ पितामह! भगवान् श्रीकृष्ण अविनाशी ईश्वर हैं; मैं पूर्णरूपसे इनके महत्त्वका वर्णन सुनन

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नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः

भगवान् विष्णुका वराहरूपमें प्रकट होकर देवताओंकी रक्षा और दानवोंका विनाश कर देना तथा नारदको अनुस्मृतिस्तोत्रका उपदेश और नारदद्वारा भगवान्‌की स्तुति

युधिष्ठिर उवाच

पितामह महाप्राज्ञ युधि सत्यपराक्रम ।
श्रोतुमिच्छामि कार्त्स्न्येन कृष्णमव्ययमीश्वरम् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**युद्धमें सच्चा पराक्रम प्रकट करनेवाले महाप्राज्ञ पितामह! भगवान् श्रीकृष्ण अविनाशी ईश्वर हैं; मैं पूर्णरूपसे इनके महत्त्वका वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

यच्चास्य तेजः सुमहद् यच्च कर्म पुरा कृतम् ।
तन्मे सर्वं यथातत्त्वं ब्रूहि त्वं पुरुषर्षभ ॥ २ ॥
पुरुषप्रवर! इनका जो महान् तेज है, इन्होंने पूर्वकालमें जो महान् कर्म किया है, वह सब आप मुझे यथार्थरूपसे बताइये ॥ २ ॥

तिर्यग्योनिगतं रूपं कथं धारितवान् प्रभुः ।
केन कार्यनिसर्गेण तमाख्याहि महाबल ॥ ३ ॥
महाबली पितामह! सम्पूर्ण जगत्‌के प्रभु होकर भी इन्होंने किस निमित्तसे तिर्यग्योनिमें जन्म ग्रहण किया; यह मुझे बताइये ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

पुराहं मृगयां यातो मार्कण्डेयाश्रमे स्थितः ।
तत्रापश्यं मुनिगणान् समासीनान् सहस्रशः ॥ ४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! पहलेकी बात है, मैं शिकार खेलनेके लिये वनमें गया और मार्कण्डेय मुनिके आश्रमपर ठहरा। वहाँ मैंने सहस्रों मुनियोंको बैठे देखा ॥ ४ ॥

ततस्ते मधुपर्केण पूजां चक्रुरथो मयि ।
प्रतिगृह्य च तां पूजां प्रत्यनन्दमृषीनहम् ॥ ५ ॥
मेरे जानेपर उन महर्षियोंने मधुपर्क समर्पित करके मेरा आतिथ्य-सत्कार किया। मैंने भी उनका सत्कार ग्रहण करके उन सभी महर्षियोंका अभिनन्दन किया ॥ ५ ॥

कथैषा कथिता तत्र कश्यपेन महर्षिणा ।
मनःप्रह्लादिनीं दिव्यां तामिहैकमनाः शृणु ॥ ६ ॥
फिर महर्षि कश्यपने मनको आनन्द प्रदान करनेवाली यह दिव्य कथा मुझे सुनायी। मैं उसे कहता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ६ ॥

पुरा दानवमुख्या हि क्रोधलोभसमन्विताः । बलेन मत्ताः शतशो नरकाद्या महासुराः ॥ ७ ॥ पूर्वकालमें नरकासुर आदि सैकड़ों मुख्य-मुख्य दानव क्रोध और लोभके वशीभूत हो बलके मदसे मतवाले हो गये थे ॥ ७ ॥

तथैव चान्ये बहवो दानवा युद्धदुर्मदाः । न सहन्ते स्म देवानां समृद्धिं तामनुत्तमाम् ॥ ८ ॥ इनके सिवा और भी बहुत-से रणदुर्मद दानव थे, जो देवताओंकी उत्तम समृद्धिको सहन नहीं कर पाते थे ॥

दानवैरर्द्यमानास्तु देवा देवर्षयस्तथा । न शर्म लेभिरे राजन् विशमानास्ततस्ततः ॥ ९ ॥ राजन्! उन दानवोंसे पीड़ित हो देवता और देवर्षि कहीं चैन नहीं पाते थे। वे इधर-उधर लुकते-छिपते फिरते थे ॥ ९ ॥

पृथिवीमार्तरूपां ते समपश्यन् दिवौकसः । दानवैरभिसंस्तीर्णां घोररूपैर्महाबलैः ॥ १० ॥ समूचे भूमण्डलमें भयानक रूपधारी महाबली दानव फैल गये थे। देवताओंने देखा, यह पृथ्वी दानवोंके पापभारसे पीड़ित एवं आर्त हो उठी है ॥ १० ॥

भारार्तामप्रहृष्टां च दुःखितां संनिमज्जतीम् । अथादितेयाः संत्रस्ता ब्रह्माणमिदमब्रुवन् ॥ ११ ॥ यह भारसे व्याकुल, हर्ष और उल्लाससे शून्य तथा दुखी हो रसातलमें डूब रही है। यह देखकर अदितिके सभी पुत्र भयसे थर्रा उठे और ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले— ॥ ११ ॥

कथं शक्ष्यामहे ब्रह्मन् दानवैरभिमर्दनम् । स्वयम्भूस्तानुवाचेदं निसृष्टोऽत्र विधिर्मया ॥ १२ ॥ ‘ब्रह्मन्! दानवलोग जो हमें इस प्रकार रौंद रहे हैं, इसे हम किस प्रकार सह सकेंगे?' तब स्वयम्भू ब्रह्मा‍ने उनसे इस प्रकार कहा—'देवताओ! इस विपत्तिको दूर करनेके लिये मैंने उपाय कर दिया है ॥ १२ ॥

ते वरेणाभिसम्पन्ना बलेन च मदेन च । नावबुध्यन्ति सम्मूढा विष्णुमव्यक्तदर्शनम् ॥ १३ ॥ वराहरूपिणं देवमधृष्यममरैरपि । ‘वे दानव वर पाकर बल और अभिमानसे मत्त हो उठे हैं। वे मूढ़ दैत्य अव्यक्तस्वरूप भगवान् विष्णुको नहीं जानते, जो देवताओंके लिये भी दुर्धर्ष हैं। उन्होंने वाराह रूप धारण कर रखा है ॥ १३ १/२ ॥

एष वेगेन गत्वा हि यत्र ते दानवाधमाः ॥ १४ ॥ अन्तर्भूमिगता घोरा निवसन्ति सहस्रशः ।

शमयिष्यति तच्छ्रुत्वा जहृषुः सुरसत्तमाः ॥ १५ ॥
‘वे सहस्रों घोर दैत्य और दानवाधम भूमिके भीतर पाताललोकमें निवास करते हैं; भगवान् वराह वेगपूर्वक वहीं जाकर उन सबका विनाश कर देंगे। यह सुनकर सभी श्रेष्ठ देवता हर्षसे खिल उठे ॥ १४-१५ ॥

ततो विष्णुर्महातेजा वाराहं रूपमास्थितः ।
अन्तर्भूमिं सम्प्रविश्य जगाम दितिजान् प्रति ॥ १६ ॥
उधर महातेजस्वी भगवान् विष्णु वाराहरूप धारण कर बड़े वेगसे भूमिके भीतर प्रविष्ट हुए और दैत्योंके पास जा पहुँचे ॥ १६ ॥

दृष्ट्वा च सहिताः सर्वे दैत्याः सत्त्वममानुषम् ।
प्रसह्य तरसा सर्वे संतस्थुः कालमोहिताः ॥ १७ ॥
उस अलौकिक जन्तुको देखकर सब दैत्य एक साथ हो वेगपूर्वक उसका सामना करनेके लिये हठात् खड़े हो गये; क्योंकि वे कालसे मोहित हो रहे थे ॥

ततस्ते समभिद्रुत्य वराहं जगृहुः समम् ।
संक्रुद्धाश्च वराहं तं व्यकर्षन्त समन्ततः ॥ १८ ॥
उन सबने कुपित होकर भगवान् वराहपर एक साथ धावा बोल दिया और उन्हें हाथोंहाथ पकड़ लिया। पकड़कर वे वाराहदेवको चारों ओरसे खींचने लगे ॥ १८ ॥

दानवेन्द्रा महाकाया महावीर्यबलोच्छ्रिताः ।
नाशक्नुवंश्च किंचित् ते तस्य कर्तुं तदा विभो ॥ १९ ॥
प्रभो! यद्यपि वे विशालकाय दानवराज महान् बल और वीर्यसे सम्पन्न थे, तो भी उन भगवान्‌का कुछ बिगाड़ न सके ॥ १९ ॥

ततोऽगच्छत् विस्मयं ते दानवेन्द्रा भयं तथा ।
संशयं गतमात्मानं मेनिरे च सहस्रशः ॥ २० ॥
इससे उन दानवेन्द्रोंको बड़ा विस्मय और भय प्राप्त हुआ। वे सहस्रों दैत्य अपने आपको जीवनके संशयमें पड़ा हुआ मानने लगे ॥ २० ॥

ततो देवाधिदेवः स योगात्मा योगसारथिः ।
योगमास्थाय भगवांस्तदा भरतसत्तम ॥ २१ ॥
विननाद महानादं क्षोभयन् दैत्यदानवान् ।
संनादिता येन लोकाः सर्वांश्चैव दिशो दश ॥ २२ ॥
भरतश्रेष्ठ! इसके बाद योगस्वरूप योगके नियन्ता देवाधिदेव भगवान् वराह दैत्यों और दानवोंको क्षोभमें डालनेके लिये योगका आश्रय ले बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। उस भीषण गर्जनासे तीनों लोक और ये सारी दसों दिशाएँ गूँज उठीं ॥ २१-२२ ॥

तेन संनादशब्देन लोकानां क्षोभ आगमत् ।
संत्रस्ताश्च भृशं लोके देवाः शक्रपुरोगमाः ॥ २३ ॥

उस भीषण गर्जनासे समस्त लोकोंमें हलचल मच गयी। स्वर्गलोकमें इन्द्र आदि देवता भी अत्यन्त भयभीत हो उठे ॥ २३ ॥
निर्विचेष्टं जगच्चापि बभूवातिभृशं तदा ।
स्थावरं जङ्गमं चैव तेन नादेन मोहितम् ॥ २४ ॥
उस सिंहनादसे मोहित होकर समस्त चराचर जगत् अत्यन्त चेष्टारहित हो गया ॥ २४ ॥
ततस्ते दानवाः सर्वे तेन नादेन भीषिताः ।
पेतुर्गतासवश्चैव विष्णुतेजःप्रमोहिताः ॥ २५ ॥
तदनन्तर वे सब दानव भगवान्‌की उस गर्जनासे भयभीत हो प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। वे सब-के-सब भगवान् विष्णुके तेजसे मोहित हो अपनी सुध-बुध खो बैठे थे ॥ २५ ॥
रसातलगतश्चापि वराहस्त्रिदशद्विषाम् ।
खुरैर्विदारयामास मांसमेदोऽस्थिसंचयान् ॥ २६ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1345)

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भगवान् वराहकी ऋषियोंद्वारा स्तुति

रसातलमं जाकर भी भगवान् वाराहने देवद्रोही असुरोंको अपने खुरोंसे विदीर्ण कर दिया। उनके मांस, मेदा और हड्डियोंके ढेर लग गये थे ॥ २६ ॥ नादेन तेन महता सनातन इति स्मृतः। पद्मनाभो महायोगी भूताचार्यः स भूतराट् ॥ २७ ॥ सम्पूर्ण प्राणियोंके आचार्य और स्वामी महायोगी वे भगवान् पद्मनाभ अपने महान् सिंहनादके कारण 'सनातन*' माने गये हैं ॥ २७ ॥ ततो देवगणाः सर्वे पितामहमुपाद्रवन् । तत्र गत्वा महात्मानमूचुश्चैव जगत्पतिम् ॥ २८ ॥ नादोऽयं कीदृशो देव नैतं विद्म वयं प्रभो। कोऽसौ हि कस्य वा नादो येन विह्वलितं जगत् ॥ २९ ॥ देवाश्च दानवाश्चैव मोहितास्तस्य तेजसा । उनके उस सिंहनादको सुनकर सब देवता जगदीश्वर भगवान् ब्रह्माजीके पास गये। वहाँ पहुँचकर वे इस प्रकार बोले—'देव! प्रभो! यह कैसा सिंहनाद है? इसे हमलोग नहीं जानते। वह कौन वीर है? अथवा किसकी गर्जना है? जिसने इस जगत्‌को व्याकुल कर दिया है। देवता और दानव सभी उसके तेजसे मोहित हो रहे हैं' ॥ २८-२९ १/२ ॥ एतस्मिन्नन्तरे विष्णुर्वाराहं रूपमास्थितः। उदतिष्ठन्महाबाहो स्तूयमानो महर्षिभिः ॥ ३० ॥ महाबाहो! इसी बीचमें वाराहरूपधारी भगवान् विष्णु जलसे ऊपर उठे। उस समय महर्षिगण उनकी स्तुति कर रहे थे ॥ ३० ॥

पितामह उवाच

निहत्य दानवपतीन् महावर्मा महाबलः। एष देवो महायोगी भूतात्मा भूतभावनः ॥ ३१ ॥ ब्रह्माजी बोले—देवताओ! ये महाकाय महाबली महायोगी भूतभावन भूतात्मा भगवान् विष्णु हैं, जो दानवराजोंका वध करके आ रहे हैं ॥ ३१ ॥ सर्वभूतेश्वरो योगी मुनिरात्मा तथाऽऽत्मनः । स्थिरीभवत कृष्णोऽयं सर्वविघ्नविनाशनः ॥ ३२ ॥ ये सम्पूर्ण भूतोंके ईश्वर, योगी, मुनि तथा आत्माके भी आत्मा हैं, ये ही समस्त विघ्नोंका विनाश करनेवाले श्रीकृष्ण हैं; अतः तुमलोग धैर्य धारण करो ॥ ३२ ॥ कृत्वा कर्मातिसाध्येतदशक्यममितप्रभः। समायातः स्वमात्मानं महाभागो महाद्युतिः ॥ ३३ ॥ अनन्त प्रभासे परिपूर्ण, महातेजस्वी एवं महान् सौभाग्यके आश्रयभूत ये भगवान् अत्यन्त उत्तम और दूसरोंके लिये असम्भव कार्य करके आ रहे हैं ॥ ३३ ॥

पद्मनाभो महायोगी महात्मा भूतभावनः । न संतापो न भीः कार्या शोको वा सुरसत्तमाः ॥ ३४ ॥ सुरश्रेष्ठगण! ये महायोगी भूतभावन महात्मा पद्मनाभ हैं; अतः तुम्हें अपने मनसे संताप, भय एवं शोकको दूर कर देना चाहिये ॥ ३४ ॥

विधिरेश प्रभावश्च कालः संक्षयकारकः । लोकान् धारयता तेन नादो मुक्तो महात्मना ॥ ३५ ॥ ये ही विधि हैं, ये ही प्रभाव हैं और ये ही संहारकारी काल हैं, इन्हीं परमात्माने सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करते हुए यह भीषण सिंहनाद किया है ॥ ३५ ॥

स एष हि महाबाहुः सर्वलोकनमस्कृतः । अच्युतः पुण्डरीकाक्षः सर्वभूतादिरीश्वरः ॥ ३६ ॥ ये सम्पूर्ण भूतोंके आदि कारण, सर्वलोकवन्दित ईश्वर महाबाहु कमलनयन अच्युत हैं ॥ ३६ ॥

(युधिष्ठिर उवाच)

पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । प्रयाणकाले किं जप्यं मोक्षिभिस्तत्त्वचिन्तकैः ॥ युधिष्ठिरने पूछा— सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण महाप्राज्ञ पितामह! मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले तत्त्व-चिन्तकोंको मृत्युकालमें किस मन्त्रका जप करना चाहिये ॥

किमनुस्मरन् कुरुश्रेष्ठ मरणे पर्युपस्थिते । प्राप्नुयात् परमां सिद्धिं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ कुरुश्रेष्ठ! मृत्युका समय उपस्थित होनेपर किसका चिन्तन करनेवाला पुरुष परम सिद्धिको प्राप्त हो सकता है? यह मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ॥

भीष्म उवाच

सद्युक्तिसहितः सूक्ष्म उक्तः प्रश्नस्त्वयानघ । शृणुष्वावहितो राजन् नारदेन पुरा श्रुतम् ॥ भीष्मजीने कहा— राजन्! निष्पाप नरेश! तुमने जो प्रश्न उपस्थित किया है, वह उत्तम युक्तियुक्त और सूक्ष्म है। उसे सावधान होकर सुनो। जो पूर्वकालमें मैंने नारदजीसे सुना था, वहीं मैं तुमसे कहता हूँ ॥

श्रीवत्साङ्कं जगद्बीजमनन्तं लोकसाक्षिणम् । पुरा नारायणं देवं नारदः परिपृष्टवान् ॥ जिनका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित है, जो इस जगत्के बीज (मूल कारण) हैं, जिनका कहीं अन्त नहीं है तथा जो इस जगत्के साक्षी हैं, उन्हीं भगवान् नारायणसे पूर्वकालमें नारदजीने इस प्रकार प्रश्न किया ॥

नारद उवाच

त्वामक्षरं परं ब्रह्म निर्गुणं तमसः परम् ।
आहुर्वेद्यं परं धाम ब्रह्मादिकमलोद्भवम् ॥
भगवन् भूतभव्येश श्रद्दधानैर्जितेन्द्रियैः ।
कथं भक्तैर्विचिन्त्योऽसि योगिभिर्मोक्षकांक्षिभिः ॥
नारदजीने पूछा— भगवन्! महर्षिगण कहते हैं, आप अविनाशी (नित्य), परब्रह्म, निर्गुण, अज्ञानान्धकार एवं तमोगुणसे अतीत, विद्याके अधिपति, परम धामस्वरूप, ब्रह्मा तथा उनकी प्राकट्यभूमि—आदिकमलके उत्पत्ति-स्थान हैं। भूत और भविष्यके स्वामी परमेश्वर! श्रद्धालु और जितेन्द्रिय भक्तों तथा मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले योगियोंको आपके स्वरूपका किस प्रकार चिन्तन करना चाहिये? ।।

किं च जप्यं जपेन्नित्यं कल्यमुत्थाय मानवः ।
कथं युञ्जन् सदा ध्यायेद् ब्रूहि तत्त्वं सनातनम् ॥
मनुष्य प्रतिदिन सबेरे उठकर किस जपनीय मन्त्रका जप करे और योगी पुरुष किस प्रकार निरन्तर ध्यान करे? आप इस सनातन तत्त्वका वर्णन कीजिये ।।

श्रुत्वा तस्य तु देवर्षेर्वाक्यं वाचस्पतिः स्वयं ।
प्रोवाच भगवान् विष्णुर्नारदं वरदः प्रभुः ॥
देवर्षि नारदका यह वचन सुनकर वाणीके अधिपति वरदायक भगवान् विष्णुने नारदजीसे इस प्रकार कहा ।।

श्रीभगवानुवाच

हन्त ते कथयिष्यामि इमां दिव्यानुस्मृतिम् ।
यामधीत्य प्रयाणे तु मद्भावायोपपद्यते ॥
श्रीभगवान् बोले— देवर्षे! मैं हर्षपूर्वक तुम्हारे सामने इस दिव्य अनुस्मृतिका वर्णन करता हूँ। मृत्युकालमें जिसका अध्ययन और श्रवण करके मनुष्य मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ।।

ओङ्कारमग्रतः कृत्वा मां नमस्कृत्य नारद ।
एकाग्रः प्रयतो भूत्वा इमं मन्त्रमुदीरयेत् ॥
ओं नमो भगवते वासुदेवायति ।
नारद! आदिमें ओंकारका उच्चारण करके मुझे नमस्कार करे। अर्थात् एकाग्र एवं पवित्रचित्त होकर इस मन्त्रका उच्चारण करे—‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ इति ।।

इत्युक्तो नारदः प्राह प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः ॥
सर्वदेवेश्वरं विष्णुं सर्वात्मानं हरिं प्रभुम् ।

भगवान्‌के ऐसा कहनेपर नारदजी हाथ जोड़ प्रणाम करके खड़े हो गये और उन सर्वदेवेश्वर सर्वात्मा एवं पापहारी प्रभु श्रीविष्णुसे बोले।।

नारद उवाच

अव्यक्तं शाश्वतं देवं प्रभवं पुरुषोत्तमम् ।।
प्रपद्ये प्राञ्जलिर्विष्णुमक्षरं परमं पदम् ।
**नारदजीने कहा—**प्रभो! जो अव्यक्त सनातन देवता, सबकी उत्पत्तिके कारण, पुरुषोत्तम, अविनाशी और परम पदस्वरूप हैं, उन भगवान्‌ विष्णुकी मैं हाथ जोड़कर शरण लेता हूँ।।
पुराणं प्रभवं नित्यमक्षयं लोकसाक्षिणम् ।।
प्रपद्ये पुण्डरीकाक्षमीशं भक्तानुकम्पिनम् ।
जो पुराणपुरुष, सबकी उत्पत्तिके कारण, नित्य, अक्षय और सम्पूर्ण जगत्‌के साक्षी हैं, जिनके नेत्र कमलके समान सुन्दर हैं, उन भक्तवत्सल भगवान्‌ विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ।।
लोकनाथं सहस्राक्षमद्भुतं परमं पदम् ।।
भगवन्तं प्रपन्नोऽस्मि भूतभव्यभवत्प्रभुम् ।
जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी तथा संरक्षक हैं, जिनके सहस्रों नेत्र हैं; तथा जो भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी हैं, उन अद्भुत परमपदरूप भगवान्‌ विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ।।
स्रष्टारं सर्वलोकानामनन्तं विश्वतोमुखम् ।।
पद्मनाभं हृषीकेशं प्रपद्ये सत्यमच्युतम् ।
समस्त लोकोंके स्रष्टा और सब ओर मुखवाले, अनन्त, सत्य, अच्युत एवं सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी भगवान्‌ पद्मनाभकी मैं शरण लेता हूँ।।
हिरण्यगर्भममृतं भूगर्भं परतः परम् ।।
प्रभोः प्रभुमनाद्यन्तं प्रपद्ये तं रविप्रभम् ।
जो हिरण्यगर्भ, अमृतस्वरूप, पृथ्वीको गर्भमें धारण करनेवाले, परात्पर तथा प्रभुओंके भी प्रभु हैं, उन अनादि, अनन्त तथा सूर्यके समान कान्तिवाले भगवान्‌ श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ।।
सहस्रशीर्षं पुरुषं महर्षिं तत्त्वभावनम् ।।
प्रपद्ये सूक्ष्ममचलं वरेण्यमभयप्रदम् ।
जिनके सहस्रों मस्तक हैं, जो अन्तर्यामी आत्मा हैं, तत्त्वोंका चिन्तन करनेवाले महर्षि कपिलस्वरूप हैं, उन सूक्ष्म, अचल, वरेण्य और अभयप्रद भगवान्‌ श्रीहरिकी शरण लेता हूँ।।
नारायणं पुराणर्षिं योगात्मानं सनातनम् ।।

संस्थानं सर्वतत्त्वानां प्रपद्ये ध्रुवमीश्वरम् ।
जो पुरातन ऋषि नारायण हैं, योगात्मा हैं, सनातन पुरुष हैं, सम्पूर्ण तत्त्वोंके अधिष्ठान एवं अविनाशी ईश्वर हैं, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ॥
यः प्रभुः सर्वभूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।।
चराचरगुरुर्विष्णुः स मे देवः प्रसीदतु ।
जो सम्पूर्ण भूतोंके प्रभु हैं, जिन्होंने इस समस्त संसारको व्याप्त कर रखा है; तथा जो चर और अचर प्राणियोंके गुरु हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।।
यस्मादुत्पद्यते ब्रह्मा पद्मयोनिः पितामहः ।।
ब्रह्मयोनिर्हि विश्वात्मा स मे विष्णुः प्रसीदतु ।
जिनसे पद्मयोनि पितामह ब्रह्माकी उत्पत्ति होती है; तथा जो वेद और ब्राह्मणोंकी योनि हैं, वे विश्वात्मा विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।।
यः पुरा प्रलये प्राप्ते नष्टे स्थावरजङ्गमे ।
ब्रह्मादिषु प्रलीनेषु नष्टे लोके परावरे ।।
आभूतसम्प्लवे चैव प्रलीने प्रकृतौ महान् ।
एकस्तिष्ठति विश्वात्मा स मे विष्णुः प्रसीदतु ।।
प्राचीन कालमें महाप्रलय प्राप्त होनेपर जब सभी चराचर प्राणी नष्ट हो जाते हैं, ब्रह्मा आदि देवताओंका भी लय हो जाता है और संसारकी छोटी-बड़ी सभी वस्तुएँ लुप्त हो जाती हैं; तथा सम्पूर्ण भूतोंका क्रमशः लय होकर जब प्रकृतिमें महत्तत्त्व भी विलीन हो जाता है, उस समय जो एकमात्र शेष रह जाते हैं, वे विश्वात्मा विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।।
चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च ।
हूयते च पुनर्द्वाभ्यां स मे विष्णुः प्रसीदतु ।।
चार<sup></sup>, चार<sup></sup>, दो<sup></sup>, पाँच<sup></sup> तथा दो<sup></sup>—इन सत्रह अक्षरोंवाले मन्त्रोंद्वारा जिन्हें आहुति दी जाती है, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।।
पर्जन्यः पृथिवी सस्यं कालो धर्मः क्रियाक्रिये ।
गुणाकरः स मे बभ्रुर्वासुदेवः प्रसीदतु ।।
मेघ, पृथ्वी, सस्य, काल, धर्म, कर्म और कर्मका अभाव—ये सब जिनके स्वरूप हैं, गुणोंके भण्डाररूप वे श्यामवर्ण भगवान् वासुदेव मुझपर प्रसन्न हों ।।
अग्नीषोमार्कंताराणां ब्रह्मरुद्रेन्द्रयोगिनाम् ।
यस्तेजयति तेजांसि स मे विष्णुः प्रसीदतु ।।
जो अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, तारागण, ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र तथा योगियोंके भी तेजको जीत लेते हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।।
योगावास नमस्तुभ्यं सर्वावास वरप्रद ।
यज्ञगर्भ हिरण्याङ्ग पञ्चयज्ञ नमोऽस्तु ते ।।

योगके आवासस्थान! आपको नमस्कार है। सबके निवासस्थान, वरदायक, यज्ञगर्भ, सुनहरे रंगोंवाले पञ्चयज्ञमय परमेश्वर! आपको नमस्कार है॥ चतुर्मूर्ते परं धाम लक्ष्म्यावास परार्चित । सर्वावास नमस्तेऽस्तु वासुदेव प्रधानकृत् ॥ आप श्रीकृष्ण, बलभद्र, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार रूपोंवाले, परमधामस्वरूप, लक्ष्मीनिवास, परमपूजित, सबके आवासस्थान और प्रकृतिके भी प्रवर्तक हैं। वासुदेव! आपको नमस्कार है॥ अजस्त्वमगमः पन्था ह्यमूर्तिर्विश्वमूर्तिधृक् । विकर्तः पञ्चकालज्ञ नमस्ते ज्ञानसागर ॥ आप अजन्मा हैं, अगम्य मार्ग हैं, निराकार हैं अथवा जगत्के सम्पूर्ण आकार आप ही धारण करते हैं, आप ही संहारकारी रुद्र हैं। आप प्रातः, सङ्गव, मध्याह्न, अपराह्न और सायाह्न—इन पाँच कालोंको जाननेवाले हैं। ज्ञानसागर! आपको नमस्कार है॥ अव्यक्ताद् व्यक्तमुत्पन्नं व्यक्ताद् यस्तु परोऽक्षरः । यस्मात् परतरं नास्ति तमस्मि शरणं गतः ॥ जिन अव्यक्त परमात्मासे इस व्यक्त जगत्की उत्पत्ति हुई है, जो व्यक्तसे परे और अविनाशी हैं, जिनसे उत्कृष्ट दूसरी कोई वस्तु नहीं है, उन भगवान् विष्णुकी मैं शरणमें आया हूँ॥ न प्रधानो न च महान् पुरुषश्चेतनो ह्यजः । अनयोर्यः परतरः तमस्मि शरणं गतः ॥ प्रकृति और महत्तत्त्व—ये दोनों जड हैं। पुरुष चेतन और अजन्मा है। इन दोनों क्षर और अक्षर पुरुषोंसे जो उत्कृष्ट और विलक्षण हैं, उन भगवान् पुरुषोत्तमकी मैं शरण लेता हूँ॥ चिन्तयन्तो हि यं नित्यं ब्रह्मेशानादयः प्रभुम् । निश्चयं नाधिगच्छन्ति तमस्मि शरणं गतः ॥ ब्रह्मा और शिव आदि देवता जिन भगवान्‌का सदा चिन्तन करते रहनेपर भी उनके स्वरूपके सम्बन्धमें किसी निश्चयतक नहीं पहुँच पाते, उन परमेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ॥ जितेन्द्रिया महात्मानो ज्ञानध्यानपरायणाः । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तमस्मि शरणं गतः ॥ ज्ञानी और ध्यानपरायण जितेन्द्रिय महात्मा जिन्हें पाकर फिर इस संसारमें नहीं लौटते हैं, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ॥ एकांशेन जगत् सर्वमवष्टभ्य विभुः स्थितः । अग्राह्यो निर्गुणो नित्यस्तमस्मि शरणं गतः ॥

जो सर्वव्यापी परमेश्वर इस सम्पूर्ण जगत्को अपने एक अंशसे धारण करके स्थित हैं, जो किसी इन्द्रियविशेषके द्वारा ग्रहण नहीं किये जाते तथा जो निर्गुण एवं नित्य हैं, उन परमात्माकी मैं शरणमें जाता हूँ॥

सोमार्काग्निमयं तेजो या च तारामयी द्युतिः ।
दिवि संजायते योऽयं स महात्मा प्रसीदतु ॥
आकाशमें जो सूर्य और चन्द्रमाका तेज प्रकाशित होता है तथा तारगणोंकी जो ज्योति जगमगाती रहती है, वह सब जिनका ही स्वरूप है, वे परमात्मा मुझपर प्रसन्न हों॥

गुणादिर्निर्गुणश्चाद्यो लक्ष्मीवांश्चेतनो ह्यजः ।
सूक्ष्मः सर्वगतो योगी स महात्मा प्रसीदतु ॥
जो समस्त गुणोंके आदि कारण और स्वयं निर्गुण हैं, आदि पुरुष, लक्ष्मीवान्, चेतन, अजन्मा, सूक्ष्म, सर्वव्यापी तथा योगी हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों॥

सांख्ययोगाश्च ये चान्ये सिद्धाश्च परमर्षयः ।
यं विदित्वा विमुच्यन्ते स महात्मा प्रसीदतु ॥
ज्ञानयोगी, कर्मयोगी तथा जो दूसरे-दूसरे सिद्ध और महर्षि हैं, वे जिन्हें जानकर इस संसारसे मुक्त हो जाते हैं, वे परमात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों॥

अव्यक्तः समधिष्ठाता ह्यचिन्त्यः सदसत्परः ।
आस्थितिः प्रकृतिश्रेष्ठः स महात्मा प्रसीदतु ॥
जो अव्यक्त, सबके अधिष्ठाता, अचिन्त्य और सत्-असत्से विलक्षण हैं, आधाररहित एवं प्रकृतिसे श्रेष्ठ हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों॥

क्षेत्रज्ञः पञ्चधा भुङ्क्ते प्रकृतिं पञ्चभिर्मुखैः ।
महान् गुणांश्च यो भुङ्क्ते स महात्मा प्रसीदतु ॥
जो जीवात्मारूपसे पाँच ज्ञानेन्द्रियरूपी मुखोंद्वारा शब्द आदि पाँच विषयोंका उपभोग करते हैं तथा स्वयं महान् होकर भी जो गुणोंका अनुभव करते हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों॥

सूर्यमध्ये स्थितः सोमस्तस्य मध्ये च या स्थिता ।
भूतबाह्या च या दीप्तिः स महात्मा प्रसीदतु ॥
जो सूर्यमण्डलमें सोमरूपसे स्थित होते हैं, उस सोमके भीतर जो अलौकिक दीप्ति है, वह जिनका स्वरूप है, वे परमात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों॥

नमस्ते सर्वतः सर्व सर्वतोऽक्षिशिरोमुख ।
निर्विकार नमस्तेऽस्तु साक्षी क्षेत्रे व्यवस्थितः ॥
सर्वस्वरूप परमेश्वर! आपको सब ओरसे नमस्कार है, आपके सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं। निर्विकार परमात्मन्! आपको नमस्कार है। आप प्रत्येक क्षेत्र (शरीर)-में साक्षीरूपसे स्थित हैं॥