महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1332, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंहुए॥ ४५-४६॥ एवमेष कुरुश्रेष्ठ प्रादुर्भूतो महात्मना। कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार महात्मा श्रीकृष्णने इस लोकको उत्पन्न किया है॥ ४६ १/२ ॥ (तपः स्वरूपो महादेवः कृष्णो देवकिनन्दनः। तस्य प्रसादाद् दुःखस्य नाशं प्राप्स्यसि मानद॥ एकः कर्ता स कृष्णश्च ज्ञानिनां परमा गतिः। सबको मान देनेवाले नरेश! महान् देवता भगवान् देवकीनन्दन श्रीकृष्ण तपस्यारूप ही हैं। उन्हींकी कृपासे तुम्हारे सारे दुःखोंका नाश हो जायगा। एकमात्र जगत्स्रष्टा श्रीकृष्ण ज्ञानियोंकी परमगति हैं॥ इदमाश्रित्य देवेन्द्रो देवा रुद्रास्तथाश्विनौ॥ स्वे स्वे पदे विविशिरे भुक्तिमुक्तिविदो जनाः। तपस्यारूप इन श्रीकृष्णका आश्रय लेकर देवराज इन्द्र अन्यान्य देवता, रुद्रगण, दोनों अश्विनीकुमार तथा भोग और मोक्षके तत्त्वको जाननेवाले महर्षि अपने-अपने पदपर प्रतिष्ठित रहते हैं॥ श्रूयतामस्य सद्भावः सम्यग्ज्ञानं यथा तव। भूतानामन्तरात्मासौ स नित्यपदसंवृतः॥ वे सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मा हैं तथा नित्य वैकुण्ठधाममें अपनी योगमायासे आवृत्त होकर निवास करते हैं। उनकी सत्ता और महत्ताको तुम श्रवण करो, जिससे तुम्हें श्रीकृष्णतत्त्वका ज्ञान हो जाय॥ पुरा देवऋषिः श्रीमान् नारदः परमार्थवान्। चचार पृथिवीं कृत्स्नां तीर्थान्यनुचरन् प्रभुः॥ पहलेकी बात है परमार्थसे सम्पन्न देवर्षि श्रीनारदजी भूमण्डलके सम्पूर्ण तीर्थोंमें विचरण करते हुए घूम रहे थे॥ हिमवत्पादमाश्रित्य विचार्य च पुनः पुनः। स ददर्श हृदं तत्र पद्मोत्पलसमाकुलम्॥ वे हिमालयके समीपवर्ती पर्वतपर बारंबार विचरण करके एक ऐसे स्थानपर गये, जहाँ उन्हें कमल और उत्पलसे भरा हुआ एक सरोवर दिखायी दिया॥ ततः स्नात्वा महातेजा वाग्यतो नियतेन्द्रियः। तुष्टाव पुरुषव्याघ्रो जिज्ञासुश्च तदद्भुतम्॥ तत्पश्चात् महातेजस्वी पुरुषप्रवर नारदने उस सरोवरमें मौनभावसे स्नान करके इन्द्रियोंको संयममें रखकर उस भगवान्के स्वरूपका अद्भुत रहस्य जाननेके लिये भगवान्की स्तुति की॥ ततो वर्षशते पूर्णे भगवाँल्लोकभावनः।