भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1331

भरतश्रेष्ठ! पहलेके लोगोंमें मैथुनधर्मकी प्रवृत्ति नहीं हुई थी। इन सबको संकल्पसे ही संतान पैदा होती थी॥ ३८॥
ततस्त्रेतायुगे काले संस्पर्शाज्जायते प्रजा।
न ह्यभून्मैथुनो धर्मस्तेषामपि जनाधिप॥ ३९॥
तदनन्तर त्रेतायुगका समय आनेपर स्पर्श करनेमात्रसे संतानकी उत्पत्ति होने लगी। नरेश्वर! उस समयके लोगोंमें भी मैथुन-धर्मका प्रचार नहीं हुआ था॥ ३९॥
द्वापरे मैथुनो धर्मः प्रजानामभवन्नृप।
तथा कलियुगे राजन् द्वन्द्वमापेदिरे जनाः॥ ४०॥
नरेश्वर! द्वापरयुगमें प्रजाके मनमें मैथुनधर्मका सूत्रपात हुआ। राजन्! उसी तरह कलियुगमें भी लोग मैथुनधर्मको प्राप्त होने लगे॥ ४०॥
एष भूतपतिस्तात स्वध्यक्षश्च तथोच्यते।
निरपेक्षांश्च कौन्तेय कीर्तयिष्यामि तच्छृणु॥ ४१॥
तात कुन्तीनन्दन! ये भगवान् श्रीकृष्ण ही भूतनाथ एवं सबके अध्यक्ष कहे जाते हैं। अब जो नरकका दर्शन करनेवाले हैं, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो॥ ४१॥
दक्षिणापथजन्मानः सर्वे नरवरान्ध्रकाः।
गुहाः पुलिन्दाः शबराश्चुचुका मद्रकैः सह॥ ४२॥
नरेश्वर! दक्षिण भारतमें जन्म लेनेवाले सभी आन्ध्र, गुह, पुलिन्द, शबर, चूचुक और मद्रक-ये सब-के-सब म्लेच्छ हैं॥ ४२॥
उत्तरापथजन्मानः कीर्तयिष्यामि तानपि।
यौनकाम्बोजगान्धाराः किराता बर्बरैः सह॥ ४३॥
एते पापकृतस्तात चरन्ति पृथिवीमिमाम्।
तात! अब उत्तर भारतमें जन्म लेनेवाले म्लेच्छोंका वर्णन करूँगा; यौन, काम्बोज, गान्धार, किरात और बर्बर—ये सब-के-सब पापाचारी होकर इस सारी पृथ्वीपर विचरते रहते हैं॥ ४३ १/२॥
श्वपाकबलगृध्राणां सधर्माणो नराधिप॥ ४४॥
नैते कृतयुगे तात चरन्ति पृथिवीमिमाम्।
नरेश्वर! ये सब-के-सब चाण्डाल, कौए और गीधोंके समान आचार-विचारवाले हैं। ये सत्ययुगमें इस पृथ्वीपर नहीं विचरण करते हैं॥ ४४ १/२॥
त्रेताप्रभृति वर्धन्ते ते जना भरतर्षभ॥ ४५॥
ततस्तस्मिन् महाघोरे संध्याकाल उपस्थिते।
राजानः समसज्जन्त समासाद्येतरेतरम्॥ ४६॥
भरतश्रेष्ठ! त्रेतासे वे लोग बढ़ने लगे थे। तदनन्तर त्रेता और द्वापरका महाघोर संध्याकाल उपस्थित होनेपर राजालोग एक दूसरेसे टक्कर लेकर युद्धमें आसक्त