महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1330, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृथिवीं सोऽसृजद् विश्वां सहितां भूरितेजसा ॥ ३० ॥ उन्होंने ही अपने मनके संकल्पसे मेघों, स्थावर-जंगम प्राणियों तथा समस्त पदार्थोंसहित महान् तेजसे संयुक्त समूची पृथ्वीकी सृष्टि की ॥ ३० ॥
ततः कृष्णो महाभागः पुनरेव युधिष्ठिर । ब्राह्मणानां शतं श्रेष्ठं मुखदेवाऽसृजत् प्रभुः ॥ ३१ ॥ युधिष्ठिर! तदनन्तर महाभाग श्रीकृष्णने पुनः सैकड़ों श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको मुखसे ही उत्पन्न किया ॥ ३१ ॥
बाहुभ्यां क्षत्रियशतं वैश्यानामूरुतः शतम् । पद्भ्यां शूद्रशतं चैव केशवो भरतर्षभ ॥ ३२ ॥ भरतश्रेष्ठ! इन केशवने सैकड़ों क्षत्रियोंको अपनी दोनों भुजाओंसे, सैकड़ों वैश्योंको अपनी जाँघोंसे तथा सैकड़ों शूद्रोंको दोनों पैरोंसे उत्पन्न किया ॥ ३२ ॥
स एवं चतुरो वर्णान् समुत्पाद्य महातपाः । अध्यक्षं सर्वभूतानां धातारमकरोत् स्वयम् ॥ ३३ ॥ इस प्रकार इन महातपस्वी श्रीहरिने चारों वर्णोंको उत्पन्न करके स्वयं ही धाताको सम्पूर्ण भूतोंका अध्यक्ष बनाया ॥ ३३ ॥
वेदविद्याविधातारं ब्रह्माणममितद्युतिम् । भूतमातृगणाध्यक्षं विरूपाक्षं च सोऽसृजत् ॥ ३४ ॥ वे ही वेदविद्याको धारण करनेवाले अमित तेजस्वी ब्रह्मा हुए। फिर श्रीहरिने भूतों और मातृगणोंके अध्यक्ष विरूपाक्ष (रुद्र) की रचना की ॥ ३४ ॥
शासितारं च पापानां पितॄणां समवर्तिनम् । असृजत् सर्वभूतात्मा निधिपं च धनेश्वरम् ॥ ३५ ॥ सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा श्रीहरिने पापियोंको दण्ड देनेवाले तथा पितरोंके समवर्ती यमराजको और सम्पूर्ण निधियोंके पालक धनाध्यक्ष कुबेरको उत्पन्न किया ॥ ३५ ॥
यादसामसृजन्नाथं वरुणं च जलेश्वरम् । वासवं सर्वदेवानामध्यक्षमकरोत् प्रभुः ॥ ३६ ॥ इसी प्रकार उन्होंने जल-जन्तुओंके स्वामी जलेश्वर वरुणकी सृष्टि की। उन्हीं भगवान्ने इन्द्रको सम्पूर्ण देवताओंका अध्यक्ष बनाया ॥ ३६ ॥
यावद्यावदभूच्छ्रद्धा देहं धारयितुं नृणाम् । तावत् तावदजीवंस्ते नासीद् यमकृतं भयम् ॥ ३७ ॥ पहले मनुष्योंको जितने दिनोंतक शरीर धारण करनेकी इच्छा होती, उतने दिनोंतक वे जीवित रहते थे। उन्हें यमराजका कोई भय नहीं होता था ॥ ३७ ॥
न चैषां मैथुनो धर्मो बभूव भरतर्षभ । संकल्पादेव चैतेषामपत्यमुपपद्यते ॥ ३८ ॥