भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1377

जन्मके निमित्तसे गर्भवासका कष्ट भोगना पड़ता है। रज और वीर्यके परस्पर संयुक्त होनेपर गर्भवासका अवसर आता है, जहाँ मल और मूत्रसे भीगे तथा रक्तके विकारसे मलिन स्थानमें रहना पड़ता है ।। ६ ।। तृष्णाभिभूतस्तैर्बद्धस्तानेवाभिरिप्लवन् । संसारतन्त्रवाहिन्यस्तत्र बुद्धयेत योषितः ।। ७ ।। तृष्णासे अभिभूत तथा काम, क्रोध आदि दोषोंसे बद्ध होकर उन्हींका अनुसरण करता हुआ मनुष्य (महान् दुःख उठाता रहता है। यदि उनसे छूटनेकी इच्छा हो तो) स्त्रियोंको संसाररूपी वस्त्रको बुननेवाली तन्तुवाहिनी समझे और उनसे दूर रहे ।। ७ ।। प्रकृत्या क्षेत्रभूतास्ता नसः क्षेत्रज्ञलक्षणाः । तस्मादेवाविशेषेण नरोऽतीयाद् विशेषतः ।। ८ ।। स्त्रियाँ प्रकृतिके तुल्य हैं; अतः क्षेत्रस्वरूपा हैं और पुरुष क्षेत्रज्ञरूप हैं (जैसे प्रकृति अज्ञानी पुरुषको बाँधती है, उसी प्रकार ये स्त्रियाँ पुरुषोंको अपने मोहजालमें बाँध लेती हैं), इसलिये सामान्यतः प्रत्येक पुरुषको विशेष प्रयत्नपूर्वक स्त्रीके संसर्गसे दूर रहना चाहिये ।। ८ ।। कृत्या ह्येता घोररूपा मोहयन्त्यविचक्षणान् । रजस्यन्तर्हिता मूर्तिरिन्द्रियाणां सनातनी ।। ९ ।। ये स्त्रियाँ भयानक कृत्याके समान हैं; अतः अज्ञानी मनुष्योंको मोहमें डाल देती हैं। इन्द्रियोंमें विकार उत्पन्न करनेवाली यह सनातन नारीमूर्ति रजोगुणसे तिरोहित है ।। ९ ।। तस्मात् तदात्मकाद् रागाद् बीजाज्जायन्ति जन्तवः । स्वदेहजान्स्वसंज्ञान् यद्वदङ्गात् कृमींस्त्यजेत् । स्वसंज्ञान्स्वकांस्तद्वत् सुतसंज्ञान् कृमींस्त्यजेत् ।। १० ।। अतः स्त्रीसम्बन्धी अनुरागके कारण पुरुषके वीर्यसे जीवोंकी उत्पत्ति होती है, जैसे मनुष्य अपनी ही देहसे उत्पन्न हुए जूँ और लीख आदि स्वेदज कीटोंको अपना न मानकर त्याग देता है, उसी प्रकार अपने कहलानेवाले जो अनात्मा पुत्रनामधारी कीट हैं, उन्हें भी त्याग देना चाहिये ।। १० ।। शुक्रतो रसतश्चैव देहाज्जायन्ति जन्तवः । स्वभावात् कर्मयोगाद् वा तानुपेक्षेत बुद्धिमान् ।। ११ ।। इस शरीरसे वीर्यद्वारा अथवा पसीनोंद्वारा स्वभावसे अथवा प्रारब्धके अनुसार जन्तुओंका जन्म होता रहता है। बुद्धिमान् पुरुषोंको उनकी उपेक्षा करनी चाहिये ।। ११ ।। रजस्तमसि पर्यस्तं सत्त्वं च रजसि स्थितम् । ज्ञानाधिष्ठानमव्यक्तं बुद्धयहङ्कारलक्षणम् ।। १२ ।। तमोगुणमें स्थित रजोगुण तथा रजोगुणमें स्थित सत्त्वगुण जब रजोगुण-तमोगुणमें स्थित हो जाता है और सत्त्वगुण रजोगुणमें स्थित हो जाता है, तब ज्ञानका अधिष्ठानभूत