भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1378, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1378

अव्यक्त आत्मा बुद्धि और अहंकारसे युक्त हो जाता है ॥ १२ ॥ तद् बीजं देहिनामाहुस्तद् बीजं जीवसंज्ञितम् । कर्मणा कालयुक्तेन संसारपरिवर्तनम् ॥ १३ ॥ वह अव्यक्त आत्मा ही देहधारी प्राणियोंका बीज है और वह बीजभूत आत्मा ही गुणोंके संगके कारण जीव कहलाता है। वही कालसे युक्त कर्मसे प्रेरित हो संसार-चक्रमें घूमता रहता है ॥ १३ ॥ रमत्ययं यथा स्वप्ने मनसा देहवानिव । कर्मगर्भैर्गुणैर्देही गर्भे तदुपलभ्यते ॥ १४ ॥ जैसे स्वप्नावस्थामें यह जीव मनके द्वारा ही दूसरा शरीर धारण करके क्रीडा करता है, उसी प्रकार वह कर्मगर्भित गुणोंद्वारा गर्भमें उपलब्ध होता है ॥ १४ ॥ कर्मणा बीजभूतेन चोद्यते यद् यदिन्द्रियम् । जायते तदहङ्काराद् रागयुक्तेन चेतसा ॥ १५ ॥ बीजभूत कर्मसे जिस-जिस इन्द्रियको उत्पत्तिके लिये प्रेरणा प्राप्त होती है, रागयुक्त चित्त एवं अहंकारसे वही-वही इन्द्रिय प्रकट हो जाती है ॥ १५ ॥ शब्दरागाच्छ्रोत्रमस्य जायते भावितात्मनः । रूपरागात् तथा चक्षुर्घाणं गन्धचिकीर्षया ॥ १६ ॥ शब्दके प्रति राग होनेसे उस भावितात्मा पुरुषकी श्रवणेन्द्रिय प्रकट होती है। रूपके प्रति राग होनेसे नेत्र और गन्ध ग्रहण करनेकी इच्छा होनेसे नासिकाका प्राकट्य होता है ॥ १६ ॥ स्पर्शने त्वक् तथा वायुः प्राणापानव्यपाश्रयः । व्यानोदानौ समानश्च पञ्चधा देहयापनम् ॥ १७ ॥ स्पर्शके प्रति राग होनेसे त्वगिन्द्रिय और वायुका प्राकट्य होता है। वायु प्राण और अपानका आश्रय है। वही उदान, व्यान तथा समान है। इस प्रकार वह पाँच रूपोंमें प्रकट हो शरीर-यात्राका निर्वाह करती है ॥ १७ ॥ संजातैर्जायते गात्रैः कर्मजैर्वर्ष्मणा वृतः । दुःखाद्यन्तैर्दुःखमध्यैर्नरः शारीरमानसैः ॥ १८ ॥ मनुष्य जन्मकालमें पूर्णतः उत्पन्न हुए कर्मजनित अंगों और सम्पूर्ण शरीरसे युक्त होकर जन्म ग्रहण करता है। वह मनुष्य आदि, मध्य और अन्तमें भी शारीरिक और मानसिक दुःखोंसे पीड़ित रहता है ॥ १८ ॥ दुःखं विद्यादुपादानादभिमानाच्च वर्धते । त्यागात् तेभ्यो निरोधः स्यान्निरोधज्ञो विमुच्यते ॥ १९ ॥ शरीरके ग्रहणमात्रसे दुःखकी प्राप्ति निश्चित समझनी चाहिये। शरीरमें अभिमान करनेसे उस दुःखकी वृद्धि होती है। अभिमानके त्यागसे उन दुःखोंका अन्त होता है। जो