महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1379, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंदुःखोंके अन्त होनेकी इस कलाको जानता है, वह मुक्त हो जाता है ॥ १९ ॥ इन्द्रियाणां रजस्येव प्रलयप्रभवावुभौ । परीक्ष्य संचरेद् विद्वान् यथावच्छास्त्रचक्षुषा ॥ २० ॥ इन्द्रियोंकी उत्पत्ति और लय—ये दोनों कार्य रजोगुणमें ही होते हैं। विद्वान् पुरुष शास्त्रदृष्टिसे इन बातोंकी भलीभाँति परीक्षा करके यथोचित आचरण करे ॥ ज्ञानेन्द्रियाणीन्द्रियार्थान्नोपसर्पन्त्यतर्षुलम् । हीनैश्र्च करणैर्देही न देहं पुनरर्हति ॥ २१ ॥ जिसमें तृष्णाका अभाव है उस पुरुषको ये ज्ञानेन्द्रियाँ विषयोंकी प्राप्ति नहीं करातीं। इन्द्रियोंके विषयासक्तिसे रहित हो जानेपर देही पुनः शरीरको धारण नहीं करता ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वार्ष्णेयाध्यात्मकथने त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें श्रीकृष्णसम्बन्धी अध्यात्मका कथनविषयक दो सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१३ ॥