महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1382, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्नान करे। यदि स्वप्नावस्थामें वीर्यपात हो जाय तो जलमें गोता लगाकर मन-ही-मन तीन बार अघमर्षण³ सूक्तका जप करे ॥ १३ ॥
पाप्मानं निर्दहेदेवमन्तर्भूतरजोमयम् । ज्ञानयुक्तेन मनसा संततेन विचक्षणः ॥ १४ ॥ विवेकी पुरुषको इस प्रकार ज्ञानयुक्त एवं संयमशील मनके द्वारा अपने अन्तःकरणमें प्रकट हुए पापमय कामविकारको दग्ध कर देना चाहिये ॥ १४ ॥
कुणपामेध्यसंयुक्तं यद्वदच्छिद्रबन्धनम् । तद्वद् देहगतं विद्यादात्मानं देहबन्धनम् ॥ १५ ॥ मुर्देके समान अपवित्र एवं मलयुक्त नाड़ियाँ जिस प्रकार देहके भीतर दृढ़तापूर्वक बँधी हुई हैं, उसी प्रकार (अज्ञानसे) उसके भीतर जीवात्मा भी दृढ़ बन्धनमें बँधा हुआ है, ऐसा जानना चाहिये ॥ १५ ॥
वातपित्तकफाद् रक्तं त्वङ्मांसं स्नायुमस्थि च । मज्जां देहं शिराजालैस्तर्पयन्ति रसा नृणाम् ॥ १६ ॥ भोजनसे प्राप्त हुए रस नाड़ीसमूहोंद्वारा संचरित होकर मनुष्योंके वात, पित्त, कफ, रक्त, त्वचा, मांस, स्नायु, अस्थि, चर्बी एवं सम्पूर्ण शरीरको तृप्त एवं पुष्ट करते हैं ॥ १६ ॥
दश विद्याद् धमन्योऽत्र पञ्चेन्द्रियगुणावहाः । याभिः सूक्ष्माः प्रतायन्ते धमन्योऽन्याः सहस्रशः ॥ १७ ॥ इस शरीरके भीतर उपर्युक्त वात, पित्त आदि दस वस्तुओंको वहन करनेवाली दस ऐसी नाड़ियाँ हैं जो पाँचों इन्द्रियोंके शब्द आदि गुणोंको ग्रहण करनेकी शक्ति प्राप्त करानेवाली हैं। उन्हींके साथ अन्य सहस्रों सूक्ष्म नाड़ियाँ सारे शरीरमें फैली हुई हैं ॥ १७ ॥
एवमेताः शिरा नद्यो रसोदा देहसागरम् । तर्पयन्ति यथाकालमापगा इव सागरम् ॥ १८ ॥ जैसे नदियाँ अपने जलसे यथासमय समुद्रको तृप्त करती रहती हैं, उसी प्रकार रसको बहानेवाली ये नाड़ीरूप नदियाँ इस देह-सागरको तृप्त किया करती हैं ॥ १८ ॥
मध्ये च हृदयस्यैका शिरा तत्र मनोवहा । शुक्रं संकल्पजं नृणां सर्वगात्रैर्विमुञ्चति ॥ १९ ॥ हृदयके मध्यभागमें एक मनोवहा नामकी नाड़ी है जो पुरुषोंके कामविषयक संकल्पके द्वारा सारे शरीरसे वीर्यको खींचकर बाहर निकाल देती है ॥ १९ ॥
सर्वगात्रप्रतायिन्यस्तस्या ह्यनुगताः शिराः । नेत्रयोः प्रतिपद्यन्ते वहन्त्यस्तैजसं गुणम् ॥ २० ॥