महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1419, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंततो निमित्ते च फले विनष्टे । अलेपमाकाशमलिङ्गमेव- मास्थाय पश्यन्ति महत्यसक्ताः ॥ ४६ ॥ श्रुति-प्रतिपादित प्रमाणोंका विचार और शास्त्रमें बताये हुए मंगलमय साधनोंका अनुष्ठान करनेसे मनुष्य जरा और मृत्युके भयसे रहित होकर सुखसे सोता है। जब पुण्य और पापका क्षय तथा उनसे मिलनेवाले सुख-दुःख आदि फलोंका नाश हो जाता है, उस समय सम्पूर्ण पदार्थोंमें सर्वथा आसक्तिसे रहित पुरुष आकाशके समान निर्लेप और निर्गुण परमात्मामें स्थित हुए उसका साक्षात्कार कर लेते हैं ॥ ४६ ॥
यथोर्णनाभिः परिवर्तमान- स्तन्तुक्षये तिष्ठति पात्यमानः । तथा विमुक्तः प्रजहाति दुःखं विध्वंसते लोष्ट इवाद्रिमृच्छन् ॥ ४७ ॥ जैसे मकड़ी जाला तानकर उसपर चक्कर लगाती रहती है; किंतु उन जालोंका नाश हो जानेपर एक स्थानपर स्थित हो जाती है, उसी प्रकार अविद्याके वशीभूत हो नीचे गिरनेवाला जीव कर्मजालमें पड़कर भटकता रहता है और उससे छूटनेपर दुःखसे रहित हो जाता है। जैसे पर्वतपर फेंका हुआ मिट्टीका ढेला उससे टकराकर चूर-चूर हो जाता है, उसी प्रकार उसके सम्पूर्ण दुःखोंका विध्वंस हो जाता है ॥ ४७ ॥
यथा रुरुः शृङ्गमथो पुराणं हित्वा त्वचं वाप्युरगो यथा च । विहाय गच्छत्यनवेक्षमाण- स्तथा विमुक्तो विजहाति दुःखम् ॥ ४८ ॥ जैसे रुरुनामक मृग अपने पुराने सींगको और साँप अपनी केंचुलको त्यागकर उसकी ओर देखे बिना ही चल देता है, उसी प्रकार ममता और अभिमानसे रहित हुआ पुरुष संसार-बन्धनसे मुक्त हो अपने सम्पूर्ण दुःखोंको दूर कर देता है ॥ ४८ ॥
द्रुमं यथा वाप्युदके पतन्त- मुत्सृज्य पक्षी निपत्यसक्तः । तथा ह्यसौ सुखदुःखे विहाय मुक्तः पराग्र्यां गतिमेत्यलिङ्गः ॥ ४९ ॥ जिस प्रकार पक्षी वृक्षको जलमें गिरते देख उसमें आसक्ति छोड़कर वृक्षका परित्याग करके उड़ जाता है, उसी प्रकार मुक्त पुरुष सुख और दुःख—दोनोंका त्याग करके सूक्ष्म शरीरसे रहित हो उत्तम गतिको प्राप्त होता है ॥ ४९ ॥
भीष्म उवाच