महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1420, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपि च भवति मैथिलेन गीतं नगरमुपाहितमग्निनाभिवीक्ष्य । न खलु मम हि दह्यतेऽत्र किंचित् स्वयमिदमाह किल स्म भूमिपालः ॥ ५० ॥ इदममृतपदं निशम्य राजा स्वयमिह पञ्चशिखेन भाष्यमाणम् । निखिलमभिसमीक्ष्य निश्चितार्थः परमसुखी विजहार वीतशोकः ॥ ५१ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! स्वयं आचार्य पंचशिखके बताये हुए इस अमृतमय ज्ञानोपदेशको सुनकर राजा जनक एक निश्चित सिद्धान्तपर पहुँच गये और सारी बातोंपर विचार करके शोकरहित हो बड़े सुखसे रहने लगे; फिर तो उनकी स्थिति ही कुछ और हो गयी। एक बार उन मिथिलानरेश राजा जनकने मिथिला-नगरीको आगसे जलती देखकर स्वयं यह उद्गार प्रकट किया था कि इस नगरके जलनेसे मेरा कुछ भी नहीं जलता है ॥ ५०-५१ ॥
इमं हि यः पठति विमोक्षनिश्चयं महीपते सततमवेक्षते तथा । उपद्रवान् नानुभवत्यदुःखितः प्रमुच्यते कपिलमिवैत्य मैथिलः ॥ ५२ ॥ राजन्! यहाँ जो मोक्षतत्त्वका निर्णय किया गया है, उसका जो पुरुष सदा स्वाध्याय और चिन्तन करता रहता है, उसे उपद्रवोंका कष्ट नहीं भोगना पड़ता। दुःख तो उसके पास कभी फटकने नहीं पाते हैं तथा जिस प्रकार राजा जनक कपिलमतावलम्बी पंचशिखके समागमसे इस ज्ञानको पाकर मुक्त हो गये थे, उसी प्रकार वह भी मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ५२ ॥
(श्रूयतां नृपशार्दूल यदर्थं दीपिता पुरा । वह्निना दीपिता सा तु तन्मे शृणु महामते ॥ नृपश्रेष्ठ! महामते! पूर्वकालमें जिस उद्देश्यसे अग्निद्वारा मिथिलानगरी जलायी गयी, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ जनको जनदेवस्तु कर्माण्यधाय चात्मनि । सर्वभावमनुप्राप्य भावेन विचचार सः ॥ जनकवंशी राजा जनदेव परमात्मामें कर्मोंको स्थापित करके सर्वात्मताको प्राप्त होकर उसी भावसे सर्वत्र विचरण करते थे ॥ यजन् ददंस्तथा जुह्वन् पालयन् पृथिवीमिमाम् । अध्यात्मविन्महाप्राज्ञस्तन्मयत्वेन निष्ठितः ॥