महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1425, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मणान् वेदसम्पन्नान् योनिगोत्रविशोधितान् । मातृतः पितृतः शुद्धान् शुद्धानाचारतः शुभान् । अरोगान् बुद्धिसम्पन्नान् शीलसत्त्वगुणान्वितान् ॥ असंकीर्णांश्च गोत्रेषु वेदव्रतसमन्वितान् । ब्राह्मणान् स्नातकान् शीघ्रं मातापितृसमन्वितान् ॥ निवेष्टुकामान् कन्यां मे दृष्ट्वाऽऽनयत शिष्यकाः ।
तब अपनी पुत्रीसे 'तथास्तु' कहकर ऋषिने शिष्योंसे कहा—'शिष्यगण! जो वेदविद्यासे सम्पन्न, निष्कलंक माता-पितासे उत्पन्न, निर्दोष कुलके बालक, शुद्ध आचार-विचारवाले, शुभ लक्षणोंसे युक्त, नीरोग, बुद्धिमान्, शील और सत्त्वसे सम्पन्न, गोत्रोंमें वर्णसंकरताके दोषसे रहित, वेदोक्त व्रतके पालनमें तत्पर, स्नातक, जीवित माता-पितावाले तथा मेरी कन्यासे विवाहकी इच्छा रखनेवाले श्रेष्ठ ब्राह्मण हों, उन सबको देखकर तुमलोग यहाँ शीघ्र बुला ले आओ।'
तच्छ्रुत्वा त्वरिताः शिष्या ह्याश्रमेषु ततस्ततः । ग्रामेषु च ततो गत्वा ब्राह्मणेभ्यो न्यवेदयन् ॥
मुनिकी यह बात सुनकर उनके शिष्योंने तुरंत इधर-उधर आश्रमों तथा गाँवोंमें जाकर ब्राह्मणोंको इसकी सूचना दी ।।
ऋषेः प्रभावं मत्वा ते कन्यायाश्च द्विजोत्तमाः । अनेकमुनयो राजन् सम्प्राप्ता देवलाश्रमम् ॥
राजन्! ऋषि और उस कन्याके प्रभावको जानकर अनेक श्रेष्ठ ब्राह्मण महर्षि देवलके आश्रमपर आये ।।
अनुमान्य यथान्यायं मुनीन् मुनिकुमारकान् । अभ्यर्च्य विधिवत् तत्र कन्यामाह पिता महान् ॥
कन्याके महान् पिता देवलने वहाँ आये हुए ऋषियों तथा ऋषिकुमारोंका यथायोग्य सम्मान तथा विधिपूर्वक पूजन करके अपनी पुत्रीसे कहा—
एतेऽपि मुनयो वत्से स्वपुत्रैकमता इह । वेदवेदाङ्गसम्पन्नाः कुलीनाः शीलसम्मताः ॥ येऽमी तेषु वरं भद्रे त्वमिच्छसि महाव्रतम् । तं कुमारं वृणीष्वाद्य तस्मै दास्याम्यहं शुभे ॥
'बेटी! ये मुनि जो यहाँ पधारे हैं, वेद-वेदांगोंसे सम्पन्न, कुलीन और शीलवान् हैं। ये मेरे लिये अपने पुत्रके समान प्रिय हैं। भद्रे! इन लोगोंमेंसे तुम जिस महान् व्रतधारी ऋषिकुमारको पति बनाना चाहो, उसे आज चुन लो, शुभे! मैं उसीके साथ तुम्हारा विवाह कर दूँगा' ।।
तथेति चोक्त्वा कल्याणी तप्तहेमनिभा तदा ।