महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1426, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वलक्षणसम्पन्ना वाक्यमाह यशस्विनी ॥ विप्राणां समितीर्दृष्ट्वा प्रणिपत्य तपोधनान् । तब 'तथास्तु' कहकर तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिवाली, समस्त शुभलक्षणोंसे सम्पन्न, यशस्विनी, कल्याणमयी सुवर्चला ब्राह्मणोंके उस समुदायको देखकर सम्पूर्ण तपोधनोंको प्रणाम करके इस प्रकार बोली— ॥
सुवर्चलोवाच
यद्यस्ति समितौ विप्रो ह्यन्धोऽनन्धः स मे वरः ॥ सुवर्चलाने कहा—इस ब्राह्मण-सभामें वही मेरा पति हो सकता है, जो अन्धा हो और अन्धा न भी हो ॥
तच्छ्रुत्वा मुनयस्तत्र वीक्षमाणाः परस्परम् । नोचुर्विप्रा महाभागाः कन्यां मत्वा ह्यवेदिकाम् ॥ उस कन्याकी यह बात सुनकर सब मुनि एक-दूसरेका मुँह देखने लगे। वे महाभाग ब्राह्मण उस कन्याको अबोध जानकर कुछ बोले नहीं ॥
कुत्सयित्वा मुनिं तत्र मनसा मुनिसत्तमाः ॥ यथागतं ययुः क्रुद्धा नानादेशनिवासिनः । कन्या च संस्थिता तत्र पितृवेश्मनि भामिनी ॥ नाना देशोंमें निवास करनेवाले वे श्रेष्ठ मुनि कुपित हो मन-ही-मन देवल ऋषिकी निन्दा करते हुए जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये और वह मानिनी कन्या वहाँ पिताके ही घरमें रह गयी।
ततः कदाचिद् ब्रह्मण्यो विद्वान् न्यायविशारदः । ऊहापोहविधानज्ञो ब्रह्मचर्यसमन्वितः ॥ वेदविद् वेदतत्त्वज्ञः क्रियाकल्पविशारदः । आत्मतत्त्वविभागज्ञः पितृमान् गुणसागरः ॥ श्वेतकेतुरिति ख्यातः श्रुत्वा वृत्तान्तमादरात् । कन्यार्थं देवलं चापि शीघ्रं तत्रागतोऽभवत् ॥ तदनन्तर किसी समय विद्वान्, ब्राह्मणभक्त, न्यायविशारद, ऊहापोह करनेमें कुशल, ब्रह्मचर्यसे सम्पन्न, वेदवेत्ता, वेदतत्त्वज्ञ, कर्मकाण्डविशारद, आत्मतत्त्वको विवेकपूर्वक जाननेवाले, जीवित पितावाले तथा सद्गुणोंके सागर श्वेतकेतु ऋषि सारा वृत्तान्त सुनकर उस कन्याको प्राप्त करनेके लिये शीघ्रतापूर्वक आदरसहित देवल ऋषिके आश्रमपर आये ॥
उद्दालकसुतं दृष्ट्वा श्वेतकेतुं महाव्रतम् । यथान्यायं च सम्पूज्य देवलः प्रत्यभाषत ॥