महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1427, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंउद्दालकके पुत्र महान् व्रतधारी श्वेतकेतुको आया देख देवलने उनकी यथायोग्य पूजा करके अपनी पुत्रीसे कहा— ।।
कन्ये एष महाभागे प्राप्तो ऋषिकुमारकः ।
वरयैनं महाप्राज्ञं वेदवेदाङ्गपारगम् ।।
‘महान् सौभाग्यशालिनी कन्ये! ये ऋषिकुमार श्वेतकेतु पधारे हैं। ये बड़े भारी पण्डित और वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् हैं। तुम इनका वरण कर लो’ ।।
तच्छ्रुत्वा कुपिता कन्या ऋषिपुत्रमुदैक्षत ।
तां कन्यामाह विप्रर्षिः सोऽहं भद्रे समागतः ।।
पिताकी यह बात सुनकर कन्याने कुपित हो ऋषिकुमार श्वेतकेतुकी ओर देखा। तब ब्रह्मर्षि श्वेतकेतुने उस कन्यासे कहा—‘भद्रे! मैं वही हूँ (जिसे तुम चाहती हो), तुम्हारे लिये ही यहाँ आया हूँ ।।
अन्धोऽहमत्र तत्त्वं हि तथा मन्ये च सर्वदा ।
विशालनयनं विद्धि तथा मां हीनसंशयम् ।।
वृणीष्व मां वरारोहे भजे च त्वामनिन्दिते ।
‘मैं अन्ध हूँ, यह यथार्थ है। मैं अपने मनमें सदा ऐसा ही मानता भी हूँ। साथ ही मैं संदेहरहित होनेके कारण विशाल नेत्रोंसे युक्त भी हूँ। ऐसा ही तुम मुझे समझो। श्रेष्ठ अंगोंवाली अनिन्द्य सुन्दरी! तुम मुझे अंगीकार करो। मैं तुम्हारी अभीष्ट-सिद्धि करूँगा ।।
येनेदं वीक्षते नित्यं वृणोति स्पृशतेऽथ वा ।।
घ्रायते वक्ति सततं येनेदं रसते पुनः ।
येनेदं मन्यते तत्त्वं येन बुध्यति वा पुनः ।।
न चक्षुर्विद्यते ह्येतत् स वै भूतान्ध उच्यते ।
‘जिस परमात्माकी शक्तिसे जीवात्मा सदा यह सब कुछ देखता है, ग्रहण करता है, स्पर्श करता है, सूँघता है, बोलता है, निरन्तर विभिन्न वस्तुओंका स्वाद लेता है, तत्त्वका मनन करता और बुद्धिद्वारा निश्चय करता है, वह परमात्मा ही चक्षु* कहलाता है। जो इस चक्षुसे रहित है, वही प्राणियोंमें अन्धा कहलाता है (और परमात्मारूपी चक्षुसे युक्त होनेके कारण मैं अनन्ध—नेत्रवाला भी हूँ) ।।
यस्मिन् प्रवर्तते चेदं पश्यन् शृण्वन् स्पृशन्नपि ।।
जिघ्रंश्च रसयंस्तद्वद् वर्तते येन चक्षुषा ।
तन्मे नास्ति ततो ह्यन्धो वृणु भद्रेऽद्य मामतः ।।
‘जिस परमात्माके भीतर ही यह सम्पूर्ण जगत् व्यवहारमें प्रवृत्त होता है। यह जगत् जिस आँखसे देखता, कानसे सुनता, त्वचासे स्पर्श करता, नासिकासे सूँघता, रसनासे रस लेता एवं जिस लौकिक चक्षुसे यह सारा बर्ताव करता है, उससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है, इसलिये मैं अन्ध हूँ; अतः भद्रे! तुम मेरा वरण करो ।।