महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
उद्दालकके पुत्र महान् व्रतधारी श्वेतकेतुको आया देख देवलने उनकी यथायोग्य पूजा करके अपनी पुत्रीसे कहा— ।।
कन्ये एष महाभागे प्राप्तो ऋषिकुमारकः ।
वरयैनं महाप्राज्ञं वेदवेदाङ्गपारगम् ।।
‘महान् सौभाग्यशालिनी कन्ये! ये ऋषिकुमार श्वेतकेतु पधारे हैं। ये बड़े भारी पण्डित और वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् हैं। तुम इनका वरण कर लो’ ।।
तच्छ्रुत्वा कुपिता कन्या ऋषिपुत्रमुदैक्षत ।
तां कन्यामाह विप्रर्षिः सोऽहं भद्रे समागतः ।।
पिताकी यह बात सुनकर कन्याने कुपित हो ऋषिकुमार श्वेतकेतुकी ओर देखा। तब ब्रह्मर्षि श्वेतकेतुने उस कन्यासे कहा—‘भद्रे! मैं वही हूँ (जिसे तुम चाहती हो), तुम्हारे लिये ही यहाँ आया हूँ ।।
अन्धोऽहमत्र तत्त्वं हि तथा मन्ये च सर्वदा ।
विशालनयनं विद्धि तथा मां हीनसंशयम् ।।
वृणीष्व मां वरारोहे भजे च त्वामनिन्दिते ।
‘मैं अन्ध हूँ, यह यथार्थ है। मैं अपने मनमें सदा ऐसा ही मानता भी हूँ। साथ ही मैं संदेहरहित होनेके कारण विशाल नेत्रोंसे युक्त भी हूँ। ऐसा ही तुम मुझे समझो। श्रेष्ठ अंगोंवाली अनिन्द्य सुन्दरी! तुम मुझे अंगीकार करो। मैं तुम्हारी अभीष्ट-सिद्धि करूँगा ।।
येनेदं वीक्षते नित्यं वृणोति स्पृशतेऽथ वा ।।
घ्रायते वक्ति सततं येनेदं रसते पुनः ।
येनेदं मन्यते तत्त्वं येन बुध्यति वा पुनः ।।
न चक्षुर्विद्यते ह्येतत् स वै भूतान्ध उच्यते ।
‘जिस परमात्माकी शक्तिसे जीवात्मा सदा यह सब कुछ देखता है, ग्रहण करता है, स्पर्श करता है, सूँघता है, बोलता है, निरन्तर विभिन्न वस्तुओंका स्वाद लेता है, तत्त्वका मनन करता और बुद्धिद्वारा निश्चय करता है, वह परमात्मा ही चक्षु* कहलाता है। जो इस चक्षुसे रहित है, वही प्राणियोंमें अन्धा कहलाता है (और परमात्मारूपी चक्षुसे युक्त होनेके कारण मैं अनन्ध—नेत्रवाला भी हूँ) ।।
यस्मिन् प्रवर्तते चेदं पश्यन् शृण्वन् स्पृशन्नपि ।।
जिघ्रंश्च रसयंस्तद्वद् वर्तते येन चक्षुषा ।
तन्मे नास्ति ततो ह्यन्धो वृणु भद्रेऽद्य मामतः ।।
‘जिस परमात्माके भीतर ही यह सम्पूर्ण जगत् व्यवहारमें प्रवृत्त होता है। यह जगत् जिस आँखसे देखता, कानसे सुनता, त्वचासे स्पर्श करता, नासिकासे सूँघता, रसनासे रस लेता एवं जिस लौकिक चक्षुसे यह सारा बर्ताव करता है, उससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है, इसलिये मैं अन्ध हूँ; अतः भद्रे! तुम मेरा वरण करो ।।
लोकदृष्ट्या करोमीह नित्यनैमित्तिकादिकम् ।
आत्मदृष्ट्या च तत् सर्वं विलिप्यामि च नित्यशः ॥
‘मैं लोकसंग्रहकी दृष्टिसे ही यहाँ नित्य-नैमित्तिक आदि कर्म करता हूँ तथा नित्य आत्मदृष्टि रखनेके कारण उन सब कर्मोंसे लिप्त नहीं होता हूँ ॥
स्थितोऽहं निर्भरः शान्तः कार्यकारणभावनः ।
अविद्यया तरन् मृत्युं विद्यया तं तथामृतम् ॥
यथाप्राप्तं तु संदृश्य वसामीह विमत्सरः ।
‘कार्य-कारणरूप परमात्माका चिन्तन करता हुआ मैं सदा शान्तभावसे उन्हींपर निर्भर रहता हूँ। कर्मोंके अनुष्ठानसे मृत्युको पार करके ज्ञानके द्वारा अमृतमय परमात्माका साक्षात्कार कर चुका हूँ और प्रारब्धवश जो कुछ प्रिय-अप्रिय पदार्थ प्राप्त होता है, उसको समानभावसे देखता हुआ मैं ईर्ष्या-द्वेषसे रहित होकर यहाँ निवास करता हूँ ॥
क्रीते व्यवसितं भद्रे भर्ताहं ते वृणीष्व माम् ॥
ततः सुवर्चला दृष्ट्वा प्राह तं द्विजसत्तमम् ।
‘भद्रे! मैं तुम्हारा उचित शुल्क चुकानेका निश्चय कर चुका हूँ और तुम्हारा भरण-पोषण करनेमें समर्थ हूँ; अतः तुम मेरा वरण करो।' यह सुनकर सुवर्चलाने द्विजश्रेष्ठ श्वेतकेतुकी ओर देखकर कहा ॥
सुवर्चलोवाच
मनसासि वृतो विद्वन् शेषकर्ता पिता मम ।
वृणीष्व पितरं मह्यमेष वेदविधिक्रमः ॥
सुवर्चला बोली—विद्वन्! मैंने अपने हृदयसे आपका वरण कर लिया। शास्त्रमें कथित शेष कार्योंकी पूर्ति करनेवाले मेरे पिताजी हैं। आप उनसे मुझे माँग लीजिये। यही वेदविहित मर्यादा है ॥
भीष्म उवाच
तद् विज्ञाय पिता तस्या देवलो मुनिसत्तमः ।
श्वेतकेतुं च सम्पूज्य तथैवोद्दालकेन तम् ॥
मुनीनामग्रतः कन्यां प्रददौ जलपूर्वकम् ।
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! यह सब वृत्तान्त जानकर सुवर्चलाके पिता मुनिश्रेष्ठ देवलने उद्दालकसहित श्वेतकेतुकी पूजा करके मुनियोंके सामने जलसे संकल्प करके अपनी कन्या श्वेतकेतुको दे दी ॥
उदाहरन्ति वै तत्र श्वेतकेतुं निरीक्ष्य तम् ॥
हृत्पुण्डरीकनिलयः सर्वभूतात्मको हरिः ।
श्वेतकेतुस्वरूपेण स्थितोऽसौ मधुसूदनः ॥
वहाँ श्वेतकेतुको देखकर ऋषिगण इस प्रकार कहने लगे—मानो यहाँ श्वेतकेतुके रूपमें सबके हृदय-कमलमें निवास करनेवाले, सर्वभूतस्वरूप श्रीहरि भगवान् मधुसूदन ही विराजमान हैं ।।
देवल उवाच
प्रीयतां माधवो देवः पत्नी चेयं सुता मम ।
प्रतिपादयामि ते कन्यां सहधर्मचरीं शुभाम् ।।
देवल बोले—वररूपमें विराजमान ये भगवान् लक्ष्मीपति प्रसन्न हों। यह मेरी पुत्री इन्हें पत्नीरूपसे समर्पित है। प्रभो! मैं आपको कल्याणमयी सहधर्मिणीके रूपमें अपनी यह कन्या दे रहा हूँ ।।
भीष्म उवाच
इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै देवलो मुनिपुङ्गवः ।
प्रतिगृह्य च तां कन्यां श्वेतकेतुर्महायशाः ।।
उपयम्य यथान्यायमत्र कृत्वा यथाविधि ।
समाप्य तन्त्रं मुनिभिर्वैवाहिकमनुत्तमम् ।।
स गार्हस्थ्ये वसन् धीमान् भार्यां तामिदमब्रवीत् ।।
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! ऐसा कहकर मुनिवर देवलने उन्हें कन्यादान कर दिया। महायशस्वी श्वेतकेतुने उस कन्याको लेकर उसके साथ यथोचितरूपसे विधि-पूर्वक विवाह किया। फिर मुनियोंद्वारा कराये हुए परम उत्तम वैवाहिक विधानको पूर्ण करके गृहस्थ-आश्रममें रहते हुए बुद्धिमान् श्वेतकेतुने अपनी उस धर्मपत्नीसे इस प्रकार कहा ।।
श्वेतकेतुरुवाच
यानि चोक्तानि वेदेषु तत् सर्वं कुरु शोभने ।
मया सह यथान्यायं सहधर्मचरी मम ।।
श्वेतकेतुने कहा—शोभने! वेदोंमें जिन शुभ कर्मोंका विधान है, मेरे साथ रहकर उन सबका यथोचितरूपसे अनुष्ठान करो और यथार्थरूपसे मेरी सहधर्मचारिणी बनो ।।
अहमित्येव भावेन स्थितोऽहं त्वं तथैव च ।
तस्मात् कर्माणि कुर्वीथाः कुर्यां ते च ततः परम् ।।
मैं इसी भावसे स्थित हूँ। तुम भी इसी भावसे स्थित रहना, अतः मेरी आज्ञाके अनुसार सारे कर्म करो, फिर मैं भी तुम्हारा प्रिय कार्य करूँगा ।।
न ममेति च भावेन ज्ञानाग्निनिलयेन च ।
अनन्तरं तथा कुर्यास्तानि कर्माणि भस्मसात् ।।
एवं त्वया च कर्तव्यं सर्वदादुर्भागा मया ।
यद् यदाचरति श्रेष्ठः तत् तदेवेतरो जनः ।।
तस्माल्लोकस्य सिद्ध्यर्थं कर्तव्यं चात्मसिद्धये ।।
तदनन्तर 'ये सब कर्म मेरे नहीं हैं और मैं इनका कर्ता नहीं हूँ' इस भावसे ज्ञानाग्निद्वारा उन सब कर्मोंको भस्म कर डालो, तुम परम सौभाग्यवती हो। तुम्हें सदा इसी तरह ममता और अहंकारसे रहित होकर कर्म करना चाहिये और मुझे भी ऐसा ही करना चाहिये। श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है वैसे ही दूसरे लोग भी करते हैं, अतः लोकव्यवहारकी सिद्धि तथा आत्मकल्याणके लिये हम दोनोंको कर्मोंका अनुष्ठान करते रहना चाहिये ।।
भीष्म उवाच
उक्त्वैवं स महाप्राज्ञः सर्वज्ञानैकभाजनः ।
पुत्रानुत्पाद्य तस्यां च यज्ञैः संतर्प्य देवताः ।।
आत्मयोगपरो नित्यं निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ।
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! ऐसा उपदेश देकर सम्पूर्ण ज्ञानके एकमात्र निधि महाज्ञानी श्वेतकेतुने सुवर्चलाके गर्भसे अनेक पुत्र उत्पन्न किये। यज्ञोंद्वारा देवताओंको संतुष्ट किया; फिर आत्मयोगमें नित्य तत्पर रहकर वे निर्द्वन्द्व एवं परिग्रहशून्य हो गये ।।
भार्यां तां सदृशीं प्राप्य बुद्धिं क्षेत्रज्ञयोरिव ।
लोकमन्यमनुप्राप्तौ भार्या भर्ता तथैव च ।।
साक्षिभूतौ जगत्यस्मिंश्चरमाणौ मुदान्वितौ ।
अपने अनुरूप पत्नीको पाकर श्वेतकेतु उसी प्रकार सुशोभित होते थे, जैसे बुद्धिको पाकर क्षेत्रज्ञ। वे दोनों पति-पत्नी लोकान्तरमें भी पहुँच जाते थे और इस जगत्में साक्षीकी भाँति स्थित होकर प्रसन्नतापूर्वक विचरते थे ।।
ततः कदाचिद् भर्तारं श्वेतकेतुं सुवर्चला ।
पप्रच्छ को भवानत्र ब्रूहि मे तद् द्विजोत्तम ।
तामाह भगवान् वाग्मी त्वया ज्ञातो न संशयः ।।
द्विजोत्तमेति मामुक्त्वा पुनः कमनुपृच्छसि ।
तदनन्तर एक दिन सुवर्चलाने अपने पति श्वेतकेतुसे पूछा—'द्विजश्रेष्ठ! आप कौन हैं, यह मुझे बताइये!' उस समय प्रवचन-कुशल भगवान् श्वेतकेतुने उससे कहा—'देवि! तुमने मेरे विषयमें जान ही लिया है, इसमें संदेह नहीं है। तुमने द्विजश्रेष्ठ कहकर मुझे सम्बोधित भी किया है; फिर उस द्विजश्रेष्ठके सिवा और किसको पूछ रही हो?' ।।
सा तमाह महात्मानं पृच्छामि हृदि शायिनम् ।।
तब सुवर्चलाने अपने महात्मा पतिसे कहा—'नाथ! मैं हृदय-गुफामें शयन करनेवाले आत्माको पूछती हूँ' ।।
तच्छ्रुत्वा प्रत्युवाचैनां स न वक्ष्यति भामिनि ।
नामगोत्रसमायुक्तमात्मानं मन्यसे यदि । तन्मिथ्या गोत्रसद्भावे वर्तते देहबन्धनम् ॥
यह सुनकर श्वेतकेतुने उससे कहा—'भामिनि! वह तो कुछ कहेगा नहीं। यदि तुम आत्माको नाम और गोत्रसे युक्त मानती हो तो यह तुम्हारी मिथ्या धारणा है; क्योंकि नाम-गोत्र होनेपर देहका बन्धन प्राप्त होता है ।।
अहमित्येष भावोऽत्र त्वयि चापि समाहितः । त्वमप्यहमहं सर्वमहमित्येव वर्तते ॥ नात्र तत् परमार्थं वै किमर्थमनुपृच्छसि ॥
'आत्मामें अहम् (मैं हूँ) यह भाव स्थापित किया गया है। तुममें भी वही भाव है। तुम भी अहम्, मैं भी अहम् और यह सब अहम्का ही रूप है। इसमें वह परमार्थतत्त्व नहीं है; फिर किसलिये पूछती हो?' ।।
ततः प्रहस्य सा हृष्टा भर्तारं धर्मचारिणी । उवाच वचनं काले स्मयमाना तदा नृप ॥
नरेश्वर! तब धर्मचारिणी पत्नी सुवर्चला बहुत प्रसन्न हुई, उसने हँसकर मुस्कराते हुए यह समयोचित वचन कहा ।।
सुवर्चलोवाच
किमनेकप्रकारेण विरोधेन प्रयोजनम् । क्रियाकलापैर्ब्रह्मर्षे ज्ञाननष्टोऽसि सर्वदा ॥ तन्मे ब्रूहि महाप्राज्ञ यथाहं त्वामनुव्रता ॥
सुवर्चला बोली—ब्रह्मर्षे! अनेक प्रकारके विरोधसे क्या प्रयोजन? सदा इस नाना प्रकारके क्रिया-कलापमें पड़कर आपका ज्ञान लुप्त होता जा रहा है। अतः महाप्राज्ञ! आप मुझे इसका कारण बताइये, क्योंकि मैं आपका अनुसरण करनेवाली हूँ ।।
श्वेतकेतुरुवाच
यद् यदाचरति श्रेष्ठः तत् तदेवेतरो जनः । वर्तते तेन लोकोऽयं संकीर्णश्च भविष्यति ॥
श्वेतकेतुने कहा—प्रिये! श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, वही दूसरे लोग भी करते हैं; अतः हमारे कर्म त्याग देनेसे यह सारा जनसमुदाय संकरताके दोषसे दूषित हो जायगा ।।
संकीर्णे च तथा धर्मे वर्णसंकरमेति च । संकरे च प्रवृत्ते तु मात्स्यो न्यायः प्रवर्तते ॥
इस प्रकार धर्ममें संकीर्णता आनेपर प्रजामें वर्ण-संकरता फैल जाती है और संकरता फैल जानेपर सर्वत्र मात्स्यन्यायकी प्रवृत्ति हो जाती है (जैसे प्रबल मत्स्य दुर्बल मत्स्यको
निगल जाते हैं, उसी प्रकार बलवान् मनुष्य दुर्बलोंको सताने लगते हैं) ।।
तदनिष्टं हरेर्भद्रे धातुरस्य महात्मनः ।
परमेश्वरसंक्रीडा लोकसृष्टिरियं शुभे ।।
भद्रे! सम्पूर्ण जगत्का भरण-पोषण करनेवाले परमात्मा श्रीहरिको यह अभीष्ट नहीं है। शुभे! जगत्की यह सारी सृष्टि परमेश्वरकी क्रीड़ा है ।।
यावत् पांसव उद्दिष्टास्तावत्योऽस्य विभूतयः ।
तावत्यश्चैव मायास्तु तावत्योऽस्याश्च शक्तयः ।।
धूलिके जितने कण हैं, उतनी ही परमेश्वर श्रीहरिकी विभूतियाँ हैं, उतनी ही उनकी मायाएँ हैं और उतनी ही उन मायाओंकी शक्तियाँ भी हैं ।।
एवं सुगह्वरे मुक्तो यत्र मे तद्भावाभवम् ।
छित्त्वा ज्ञानासिना गच्छेत् स विद्वान् स च मे प्रियः ।।
सोऽहमेव न संदेहः प्रतिज्ञा इति तस्य वै ।।
स्वयं भगवान् नारायणका कथन है कि 'जो मुक्तिलाभके लिये उद्योगशील पुरुष अत्यन्त गहन गुफामें रहकर ज्ञानरूप खड्गके द्वारा जन्म-मृत्युके बन्धनको काटकर मेरे धामको चला जाता है, वही विद्वान् है और वही मुझे प्रिय है। वह योगी पुरुष मैं ही हूँ। इसमें संदेह नहीं है' यह भगवान्की प्रतिज्ञा है ।।
ये मूढास्ते दुरात्मानो धर्मसंकरकारकाः ।
मर्यादाभेदका नीचा नरके यान्ति जन्तवः ।
आसुरीं योनिमापन्ना इति देवानुशासनम् ।।
'जो मूढ़, दुरात्मा, धर्मसंकरता उत्पन्न करनेवाले, मर्यादाभेदक और नीच मनुष्य हैं, वे नरकमें गिरते हैं और आसुरी योनिमें पड़ते हैं, यह भी उन्हीं भगवान्का अनुशासन है' ।।
भगवत्या तथा लोके रक्षितव्यं न संशयः ।
मर्यादालोकरक्षार्थमेवमस्मि तथा स्थितः ।।
देवि! तुम्हें भी जगत्की रक्षाके लिये लोकमर्यादाका पालन करना चाहिये। इसमें संशय नहीं है। मैं भी इसी भावसे लोक-मर्यादाकी रक्षामें स्थित हूँ ।।
सुवर्चलोवाच
शब्दः कोऽत्र इति ख्यातस्तथार्थश्च महामुने ।
आकृत्यापि तयोर्ब्रूहि लक्षणेन पृथक् पृथक् ।।
**सुवर्चलाने पूछा—**महामुने! यहाँ शब्द किसे कहा गया है और अर्थ भी क्या है? आप उन दोनोंकी आकृति और लक्षणका निर्देश करते हुए उनका पृथक्-पृथक् वर्णन कीजिये ।।
श्वेतकेतुरुवाच
व्यत्ययेन च वर्णानां परिवादकृतो हि यः ।
स शब्द इति विज्ञेयस्तन्निपातोऽर्थ उच्यते ॥
**श्वेतकेतुने कहा—**अकार आदि वर्णोंके समुदायको क्रम या व्यतिक्रमसे उच्चारण करनेपर जो वस्तु प्रकाशित होती है, उसे ‘शब्द’ जानना चाहिये और उस शब्दसे जिस अभिप्रायकी प्रतीति हो, उसका नाम ‘अर्थ’ है ॥
सुवर्चलोवाच
शब्दार्थयोर्हि सम्बन्धस्त्वनयोरस्ति वा न वा ।
तन्मे ब्रूहि यथातत्त्वं शब्दस्थानेऽर्थ एव चेत् ॥
**सुवर्चला बोली—**यदि शब्दके होनेपर ही अर्थकी प्रतीति होती है तो इन शब्द और अर्थमें कोई सम्बन्ध है या नहीं? यह आप मुझे यथार्थरूपसे बतावें ॥
श्वेतकेतुरुवाच
शब्दार्थयोर्न चैवास्ति सम्बन्धोऽत्यन्त एव हि ।
पुष्करे च यथा तोयं तथास्तीति च वेत्थ तत् ॥
**श्वेतकेतुने कहा—**शब्द और अर्थमें एक प्रकारसे कोई नियत सम्बन्ध नहीं है। कमलके पत्तेपर स्थित जलकी भाँति शब्द एवं अर्थका अनियत सम्बन्ध है, ऐसा जानो ॥
सुवर्चलोवाच
अर्थे स्थितिर्हि शब्दस्य नान्यथा च स्थितिर्भवेत् ।
विद्यते चेन्महाप्राज्ञ विनार्थं ब्रूहि सत्तम ॥
**सुवर्चला बोली—**महाप्राज्ञ! अर्थपर ही शब्दकी स्थिति है, अन्यथा उसकी स्थिति नहीं हो सकती। साधु-शिरोमणे! यदि बिना अर्थका कोई शब्द हो तो उसे बताइये ॥
श्वेतकेतुरुवाच
स संसर्गोऽतिमात्रस्तु वाचकत्वेन वर्तते ।
अस्ति चेद् वर्तते नित्यं विकारोच्चारणेन वै ॥
**श्वेतकेतुने कहा—**अर्थके साथ शब्दका वाचकत्वरूप सम्बन्ध है और वह सम्बन्ध नित्य है। यदि शब्द है तो उसका अर्थ भी सदा है ही। विपरीत क्रमसे उच्चारण करनेपर भी शब्दका कुछ-न-कुछ अर्थ होता ही है (जैसे नदी, दीन इत्यादि) ॥
सुवर्चलोवाच
शब्दस्थानोऽत्र इत्युक्तस्तथार्थ इति मे कृतम् ।
अर्थास्थितो न तिष्ठेच्च विरूढमिह भाषितम् ॥
**सुवर्चला बोली—**शब्द अर्थात् वेदका आधार है अर्थभूत परमात्मा। ऐसा ही विद्वानोंने कहा है और यही मेरा भी मत है। उस अर्थका आधार लिये बिना तो शब्द टिक ही नहीं
सकता। परंतु आप तो इनमें कोई नियत सम्बन्ध ही नहीं मानते हैं, अतः आपका कथन प्रसिद्धिके विपरीत है॥
श्वेतकेतुरुवाच
न विकूलोऽत्र कथितो नाकाशं हि विना जगत्।
सम्बन्धस्तत्र नास्त्येव तद्वदित्येष मन्यताम्॥
**श्वेतकेतुने कहा—**मैंने प्रसिद्धिके विपरीत कुछ नहीं कहा है। देखो, आकाशके बिना पृथ्वी अथवा पार्थिव जगत् टिक नहीं सकता तथापि इनमें कोई नित्य सम्बन्ध नहीं है। शब्द और अर्थका सम्बन्ध भी वैसा ही मानना चाहिये॥
सुवर्चलोवाच
सदाहङ्कारशब्दोऽयं व्यक्तमात्मनि संश्रितः।
न वाचस्तत्र वर्तन्ते इति मिथ्या भविष्यति॥
**सुवर्चला बोली—**यह 'अहम्' शब्द सदा ही आत्माके अर्थमें स्पष्टरूपसे प्रयुक्त होता है; परंतु 'यतो वाचो निवर्तन्ते' इस श्रुतिके अनुसार वहाँ वाणीकी पहुँच नहीं है; अतः आत्माके लिये 'अहम्' पदका प्रयोग भी मिथ्या ही होगा॥
श्वेतकेतुरुवाच
अहंशब्दो ह्यहंभावो नात्मभावे शुभव्रते।
न वर्तते परेऽचिन्त्ये वाचः सगुणलक्षणाः॥
**श्वेतकेतुने कहा—**शुभव्रते! अहम् शब्दका आत्म-भावमें प्रयोग नहीं होता; किंतु अहम् भावका ही आत्म-भावमें प्रयोग होता है; क्योंकि सगुण पदार्थके बोधक वचन अचिन्त्य परब्रह्म परमात्माका बोध करानेमें असमर्थ हैं॥
मृण्मये हि घटे भावस्ताद्ग्भाव इहेष्यते।
अयं भावः परेऽचिन्त्ये ह्यात्मभावो यथा च तत्॥
जैसे मिट्टीके घड़ेमें मृत्तिका-भाव होता है, उसी प्रकार परमात्मासे उत्पन्न हुए प्रत्येक पदार्थमें परमात्मभाव अभीष्ट है; अतएव अचिन्त्य परब्रह्म परमात्मामें अहम् भाव ही आत्मभाव है और वही यथार्थ है॥
अहं त्वमेतदित्येव परे संकल्पना मया।
तस्माद् वाचो न वर्तन्त इति नैव विरुध्यते॥
'मैं', 'तुम' और 'यह'—ये सब नाम परब्रह्म परमात्मामें हमलोगोंद्वारा कल्पित हैं (वास्तविक नहीं है), अतः 'उस परमात्मातक वाणीकी पहुँच नहीं हो पाती' श्रुतिके इस कथनसे कोई विरोध नहीं है॥
तस्माद् वामेन वर्तन्ते मनसा भीरु सर्वशः।
यथाकाशगतं विश्वं संसक्तमिव लक्ष्यते ।। अतएव भीरु! मनुष्य भ्रान्तचित्तद्वारा ही अहम् आदि पदोंका प्रयोग करता है। जैसे आकाशमें स्थित सम्पूर्ण विश्व उसमें सटा हुआ-सा दीखता है, उसी प्रकार परमात्मामें स्थित हुआ सारा दृश्य-प्रपंच उससे जुड़ा हुआ-सा जान पड़ता है ।। संसर्गे सति सम्बन्धात् तद् विकारं भविष्यति । अनाकाशगतं सर्वं विकारे च सदा गतम् ।। ब्रह्मके साथ जगत्का जो सम्बन्ध है, उसी सम्बन्धसे यह उसीका कार्य जान पड़ता है। जैसे सारा जगत् आकाशसे पृथक् है तो भी उसके विकारोंसे सम्बन्ध होनेके कारण सदा उससे मिश्रित ही रहता है, उसी प्रकार जगत्से ब्रह्मका कोई सम्पर्क नहीं है तो भी यह उसीसे उत्पन्न होनेके कारण तद्रूप माना जाता है ।। तद् ब्रह्म परमं शुद्धमनौपम्यं न शक्यते । न दृश्यते तथा तच्च दृश्यते च मतिर्मम ।। वह ब्रह्म परम शुद्ध और उपमारहित है; अतः वाणी-द्वारा उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। इन चर्मचक्षुओंसे उसको नहीं देखा जा सकता है तथा ज्ञानदृष्टिसे उसका साक्षात्कार होता है, ऐसा मेरा मत है ।।
सुवर्चलोवाच
निर्विकारं ह्यमूर्त्तिं च निरयं सर्वगं तथा । दृश्यते च वियन्नित्यं दृगात्मा तेन दृश्यते ।। **सुवर्चला बोली—**तब तो यह मानना होगा कि जिस प्रकार निर्विकार, निराकार, निःसीम और सर्वव्यापी आकाशका सर्वदा ही दर्शन होता है, उसीके समान ज्ञानस्वरूप आत्माका भी दर्शन होता है ।।
श्वेतकेतुरुवाच
त्वचा स्पृशति वै वायुमाकाशस्थं पुनः पुनः । तत्स्थं गन्धं तथाऽऽघ्राति ज्योतिः पश्यति चक्षुषा ।। **श्वेतकेतुने कहा—**मनुष्य त्वचाद्वारा आकाशमें स्थित वायुका बारंबार स्पर्श करता है, नासिकाद्वारा आकाशवर्ती गन्धको बारंबार सूँघता है और नेत्रद्वारा आकाशस्थित ज्योतिका दर्शन करता है ।। तमोरश्मिगणंश्चैव मेघजालं तथैव च । वर्षं तारागणं चैव नाकाशं दृश्यते पुनः ।। इसके सिवा अन्धकार, किरणसमूह, मेघोंकी घटा, वर्षा तथा तारागणका भी बारंबार दर्शन होता है; परंतु आकाश दृष्टिगोचर नहीं होता ।। आकाशस्याप्यथाकाशं सद्रूपमिति निश्चितम् ।
तदर्थे कल्पिता ह्येते तत् सत्यो विष्णुरेव च ।।
सत्स्वरूप परमात्मा उस आकाशका भी आकाश है, अर्थात् उसे भी अवकाश
देनेवाला महाकाश है; यह निश्चित है, उन्हींके लिये और उन्हींके द्वारा इस सम्पूर्ण जगत्की
सृष्टि हुई है। वे ही सत्य तथा सर्वव्यापी हैं ।।
यानि नामानि गौणानि ह्युपचारात् परात्मनि ।
न चक्षुषा न मनसा न चान्येन परो विभुः ।।
चिन्त्यते सूक्ष्मया बुद्ध्या वाचा वक्तुं न शक्यते ।
भगवान्के जो गुण-सम्बन्धी नाम हैं, वे परमात्मामें औपचारिक हैं। नेत्र, मन तथा अन्य
किसी इन्द्रियके द्वारा भी उस सर्वव्यापी परमात्माका ग्रहण नहीं हो सकता। वाणीद्वारा भी
उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। केवल सूक्ष्म बुद्धिद्वारा उनका चिन्तन एवं साक्षात्कार
किया जा सकता है ।।
एतत् प्रपञ्चमखिलं तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
महाघटोऽल्पकश्चैव यथा मह्यां प्रतिष्ठितौ ।।
यह सारा प्रपंच (समष्टि एवं व्यष्टि-जगत्) उन्हीं परमात्मामें प्रतिष्ठित है। ठीक उसी
तरह, जैसे बड़ा और छोटा घड़ा पृथ्वीपर स्थित होते हैं ।।
न च स्त्री न पुमांश्चैव तथैव न नपुंसकः ।
केवलज्ञानमात्रं तत् तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ।।
वह परमात्मा न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है, केवल ज्ञानस्वरूप है। उसीके
आधारपर यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है ।।
भूमिसंस्थानयोगेन वस्तुसंस्थानयोगतः ।
रसभेदा यथा तोये प्रकृत्यामात्मनस्तथा ।।
जैसे एक ही जलमें मृत्तिकाविशेष एवं बीज आदि द्रव्यविशेषके संयोगसे रसभेद उत्पन्न
होते हैं, उसी प्रकार प्रकृति और आत्माके संयोगसे गुण-कर्मके अनुसार अनेक प्रकारकी
सृष्टि प्रकट होती है ।।
तद्वाक्यस्मरणान्नित्यं तृप्तिं वारि पिबन्निव ।
प्राप्नोति ज्ञानमखिलं तेन तत् सुखमेधते ।।
जैसे प्यासा मनुष्य पानी पीकर तृप्ति लाभ करता है, उसी प्रकार साधक ब्रह्मबोधक
वाक्यको स्मरण करके सदा तृप्ति एवं सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करता है और उस ज्ञानसे उसका
सुख उत्तरोत्तर अभ्युदयको प्राप्त होता है ।।
सुवर्चलोवाच
अनेन साध्यं किं स्याद् वै शब्देनेति मतिर्मम ।
वेदगम्यः परोऽचिन्त्य इति पौराणिका विदुः ।।
निरर्थको यथा लोके तद्वत् स्यादिति मे मतिः ।
निरीक्ष्यैवं यथान्यायं वक्तुमर्हसि मेऽनघ ।।
सुवर्चला बोली—निष्पाप मुने! इस शब्दसे क्या सिद्ध होनेवाला है? मेरी तो ऐसी
धारणा है कि शब्दसे कुछ भी होने-जानेवाला नहीं है। परंतु पौराणिक विद्वान् ऐसा मानते हैं
कि परमात्मा अचिन्त्य एवं वेदगम्य हैं। जैसे लोकमें बहुत-से शब्द निरर्थक होते हैं, उसी
प्रकार वैदिक शब्द भी हो सकते हैं। मेरी बुद्धिमें तो यही बात आती है; अतः आप इस
विषयमें यथोचित विचार करके मुझे यथार्थ बात बतानेकी कृपा करें ।।
श्वेतकेतुरुवाच
वेदगम्यं परं शुद्धमिति सत्या परा श्रुतिः ।
व्याहत्या नैतदित्याह व्युपलिङ्गे च वर्तते ।।
श्वेतकेतुने कहा— 'शुद्धस्वरूप परब्रह्म परमात्मा वेदगम्य हैं' श्रुतिका यह कथन परम
सत्य है। इस विषयमें नास्तिकोंका कहना है कि परब्रह्मकी प्रत्यक्ष उपलब्धि न होनेसे उक्त
श्रुतिका कथन व्याघात दोषसे दूषित होनेके कारण सत्य नहीं है। इसका उत्तर आस्तिक यों
देते हैं कि सूक्ष्म शरीरविशिष्ट स्थूल देहमें जीवात्मारूपसे परब्रह्मकी ही उपलब्धि होती है;
अतः श्रुतिका पूर्वोक्त कथन यथार्थ ही है ।।
निरर्थको न चैवास्ति शब्दो लौकिक उत्तमे ।
अनन्वयास्तथा शब्दा निरर्था इति लौकिकैः ।।
उत्तम अंगोंवाली देवि! कोई लौकिक शब्द भी निरर्थक नहीं है; फिर वैदिक शब्द तो
व्यर्थ हो ही कैसे सकता है। जिन शब्दोंका परस्पर अन्वय नहीं होता—जो एक दूसरेसे
असम्बद्ध होते हैं, उन्हींको लौकिक पुरुष निरर्थक बताते हैं ।।
गृह्यन्ते तद्वदित्येव न वर्तन्ते परात्मनि ।
अगोचरत्वं वचसां युक्तमेवं तथा शुभे ।।
किंतु शुभे! लौकिक शब्दोंकी ही भाँति वैदिक शब्द भी यद्यपि सार्थक समझे जाते हैं,
तथापि वे साक्षात् परमात्माका बोध करानेमें असमर्थ हैं; क्योंकि परमात्माको वाणीका
अगोचर बताया गया है और उनकी अगोचरता युक्तिसंगत भी है ।।
साधनस्योपदेशाच्च ह्युपायस्य च सूचनात् ।
उपलक्षणयोगेन व्यावृत्या च प्रदर्शनात् ।।
वेदगम्यः परः शुद्ध इति मे धीयते मतिः ।
वेदोंमें ब्रह्मकी उपासना अथवा उसकी प्राप्तिके साधनका उपदेश है। उपासनाके उपाय
भी सूचित किये गये हैं। (जैसे ग्रहणकालमें चन्द्रमा और सूर्यके साथ राहुका दर्शन होता है
उसी प्रकार) उपलक्षण-योगसे प्रत्येक शरीरमें जीवात्मारूपसे ब्रह्मकी ही स्थितिका प्रदर्शन
किया गया है। इसके सिवा नेति-नेति आदि निषेधात्मक वचनोंद्वारा अनात्मवस्तुके
बाधपूर्वक ब्रह्मके स्वरूपकी ओर संकेत किया गया है। इसलिये शुद्धस्वरूप परमात्मा एकमात्र वेदगम्य हैं, यही मेरी सुनिश्चित धारणा है ।।
अध्यात्मध्यानसम्भूतं भूतं दीपवत् स्फुटम् ।।
ज्ञाने विद्धि शुभाचारे तेन यान्ति परां गतिम् ।
शुभ आचरणोंवाली देवि! तुम्हें यह विदित हो कि अध्यात्मतत्त्वके चिन्तनसे नित्य-ज्ञान दीपककी भाँति स्पष्टरूपसे प्रकाशित होने लगता है। उस ज्ञानसे मनुष्य परमगतिको प्राप्त होते हैं ।।
यदि मे व्याहृतं गुह्यं श्रुतं न तु त्वया शुभे ।।
तथ्यमित्येव वा शुद्धे ज्ञानं ज्ञानविलोचने ।
शुभे! शुद्धस्वरूपे! ज्ञानदृष्टिसे सम्पन्न देवि! मैंने यह जो गूढ़ एवं यथार्थ ब्रह्मज्ञानका विषय बताया है, इसे तुमने सुना है या नहीं? ।।
नानारूपवदस्यैवमैश्वर्यं दृश्यते शुभे ।
न वायुस्तन्न सूर्यस्तन्नाग्निस्तत् तु परं पदम् ।।
अनेन पूर्णमेतद्धि हृदि भूतमिहेष्यते ।
शुभे! परब्रह्म परमात्माका ऐश्वर्य नाना रूपोंमें दिखायी देता है। वायुकी वहाँतक पहुँच नहीं है। सूर्य और अग्नि उस परमपदस्वरूप परमेश्वरको प्रकाशित नहीं कर सकते। परमात्मासे ही यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण है और वे ही प्रत्येक प्राणीके हृदयमें आत्मारूपसे निवास करते हैं ।।
एतावदात्मविज्ञानमेतावद् यदहं स्मृतम् ।।
आवयोर्न च सत्त्वे वै तस्मादज्ञानबन्धनम् ।
इतना ही परमात्मविज्ञान है। इतना ही अहम् पदार्थ माना गया है। हम दोनोंकी सत्ता नित्य नहीं है, ऐसी धारणा अज्ञानके कारण होती है ।।
भीष्म उवाच
एवं सुवर्चला हृष्टा प्रोक्ता भर्त्रा यथार्थवत् ।
परिचर्यमाणा ह्यनिशं तत्त्वबुद्धिसमन्विता ।।
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! अपने पति श्वेतकेतुके इस प्रकार यथार्थ उपदेश देनेपर सुवर्चला आनन्दमग्न हो गयी। वह निरन्तर तत्त्वज्ञाननिष्ठ रहकर तदनुरूप आचरण करने लगी ।।
भर्ता च तामनुप्रेक्ष्य नित्यनैमित्तिकान्वितः ।
परमात्मनि गोविन्दे वासुदेवे महात्मनि ।।
समाधाय च कर्माणि तन्मयत्वेन भावितः ।
कालेन महता राजन् प्राप्नोति परमां गतिम् ।।
श्वेतकेतु पत्नीको साथ रखकर नित्य-नैमित्तिक कर्मोंमें संलग्न रहते थे। वे सबके हृदयमें निवास करनेवाले महामना परमात्मा गोविन्दको अपने समस्त कर्म समर्पित करके उन्हींके ध्यानमें तन्मय रहा करते थे। राजन्! इस प्रकार दीर्घकालतक परमात्मचिन्तन करके उन्होंने परमगति प्राप्त कर ली ।। एतत् ते कथितं राजन् यस्मात् त्वं परिपृच्छसि । गार्हस्थ्यं च समाधाय गतौ जायापती परम् ॥) नरेश्वर! तुमने जो प्रश्न किया था, उसके उत्तरमें मैंने यह प्रसंग सुनाया है। इस प्रकार वे दोनों पति-पत्नी गृहस्थधर्मका आश्रय लेकर परमात्माको प्राप्त हो गये ।।
युधिष्ठिर उवाच
किं कुर्वन् सुखमाप्नोति किं कुर्वन् दुःखमाप्नुयात् । किं कुर्वन्निर्भयो लोके सिद्धश्चरति भारत ॥ १ ॥ **युधिष्ठिरने पूछा—**भारत! मनुष्य क्या उपाय करनेसे सुख पाता है; क्या करनेसे दुःख उठाता है और कौन-सा काम करनेसे वह सिद्धकी भाँति संसारमें निर्भय होकर विचरता है ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
दममेव प्रशंसन्ति वृद्धाः श्रुतिसमाधयः । सर्वेषामेव वर्णानां ब्राह्मणस्य विशेषतः ॥ २ ॥ **भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! मनोयोगपूर्वक वेदार्थका विचार करनेवाले वृद्ध पुरुष सामान्यतः सभी वर्णोंके लिये और विशेषतः ब्राह्मणके लिये मन और इन्द्रियोंके संयमरूप 'दम' की ही प्रशंसा करते हैं ॥ २ ॥ नादान्तस्य क्रियासिद्धिर्यथावदुपपद्यते । क्रिया तपश्च सत्यं च दमे सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ३ ॥ जिसने दमका पालन नहीं किया है, उसे अपने कर्मोंमें यथोचित सफलता नहीं मिलती; क्योंकि क्रिया, तप और सत्य—ये सभी दमके आधारपर ही प्रतिष्ठित होते हैं ॥ ३ ॥ दमस्तेजो वर्धयति पवित्रं दम उच्यते । विपाप्मा निर्भयो दान्तः पुरुषो विन्दते महत् ॥ ४ ॥ 'दम' तेजकी वृद्धि करता है। 'दम' परम पवित्र बताया गया है, मन और इन्द्रियोंका संयम करनेवाला पुरुष पाप और भयसे रहित होकर 'महत्' पदको प्राप्त कर लेता है ॥ ४ ॥ सुखं दान्तः प्रस्वपिति सुखं च प्रतिबुद्ध्यते । सुखं लोके विपर्येति मनश्चास्य प्रसीदति ॥ ५ ॥
दमका पालन करनेवाला मनुष्य सुखसे सोता, सुखसे जागता और सुखसे ही संसारमें विचरता है तथा उसका मन भी प्रसन्न रहता है ॥ ५ ॥
तेजो दमेन ध्रियते तन्न तीक्ष्णोऽधिगच्छति ।
अमित्रांश्च बहून् नित्यं पृथगात्मनि पश्यति ॥ ६ ॥
दमसे ही तेजको धारण किया जाता है, जिसमें दमका अभाव है, वह तीव्र कामवाला रजोगुणी पुरुष उस तेजको नहीं धारण कर सकता और सदा काम, क्रोध आदि बहुत-से शत्रुओंको अपनेसे पृथक् अनुभव करता है ॥ ६ ॥
क्रव्याद्भ्य इव भूतानामदान्तेभ्यः सदा भयम् ।
तेषां विप्रतिषेधार्थं राजा सृष्टः स्वयम्भुवा ॥ ७ ॥
जिन्होंने मन और इन्द्रियोंका दमन नहीं किया है, उनसे समस्त प्राणियोंको उसी प्रकार सदा भय बना रहता है, जैसे मांसभक्षी व्याघ्र आदि जन्तुओंसे भय हुआ करता है। ऐसे उद्दण्ड मनुष्योंकी उच्छृंखल प्रवृत्तिको रोकनेके लिये ही ब्रह्माजीने राजाकी सृष्टि की है ॥ ७ ॥
आश्रमेषु च सर्वेषु दम एव विशिष्यते ।
यच्च तेषु फलं धर्मे भूयो दान्ते तदुच्यते ॥ ८ ॥
चारों आश्रमोंमें दमको ही श्रेष्ठ बताया गया है। उन सब आश्रमोंमें धर्मका पालन करनेसे जो फल मिलता है, दमनशील पुरुषको वह फल और अधिक मात्रामें उपलब्ध होता है ॥ ८ ॥
तेषां लिङ्गानि वक्ष्यामि येषां समुदयो दमः ।
अकार्पण्यमसंरम्भः संतोषः श्रद्दधानता ॥ ९ ॥
अक्रोध आर्जवं नित्यं नातिवादोऽभिमानिता ।
गुरुपूजानसूया च दया भूतेष्वपैशुनम् ॥ १० ॥
जनवादमृषावादस्तुतिनिन्दाविवर्जनम् ।
साधुकामश्च स्पृहयेन्नायतिं प्रत्ययेषु च ॥ ११ ॥
अब मैं उन लक्षणोंका वर्णन करूँगा, जिनकी उत्पत्तिमें दम ही कारण है। कृपणताका अभाव, उत्तेजनाका न होना, संतोष, श्रद्धा, क्रोधका न आना, नित्य सरलता, अधिक बकवाद न करना, अभिमानका त्याग, गुरुसेवा, किसीके गुणोंमें दोषदृष्टि न करना, समस्त जीवोंपर दया करना, किसीकी चुगली न करना, लोकापवाद, असत्यभाषण तथा निन्दा-स्तुति आदिको त्याग देना, सत्पुरुषोंके संगकी इच्छा तथा भविष्यमें आनेवाले सुखकी स्पृहा और दुःखकी चिन्ता न करना— ॥ ९—११ ॥
अवैरकृत् सूपचारः समो निन्दाप्रशंसयोः ।
सुवृत्तः शीलसम्पन्नः प्रसन्नात्माऽऽत्मवान् प्रभुः ॥ १२ ॥
प्राप्य लोके च सत्कारं स्वर्गं वै प्रेत्य गच्छति ।
जितेन्द्रिय पुरुष किसीके साथ वैर नहीं करता। उसका सबके साथ अच्छा बर्ताव होता
है। वह निन्दा और स्तुतिमें समान भाव रखनेवाला, सदाचारी, शीलवान्, प्रसन्नचित्त,
धैर्यवान् तथा दोषोंका दमन करनेमें समर्थ होता है। वह इहलोकमें सम्मान पाता और
मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें जाता है ।। १२ १/२ ।।
दुर्गमं सर्वभूतानां प्रापयन् मोदते सुखी ।। १३ ।।
सर्वभूतहिते युक्तो न स्म यो द्विषते जनम् ।
महाह्रद इवाक्षोभ्यः प्रज्ञातृप्तः प्रसीदति ।। १४ ।।
दमनशील पुरुष समस्त प्राणियोंको दुर्लभ वस्तुएँ देकर—दूसरोंको सुख पहुँचाकर
स्वयं सुखी और प्रमुदित होता है। जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें लगा रहता और किसीसे
द्वेष नहीं करता है, वह बहुत बड़े जलाशयकी भाँति गम्भीर होता है। उसके मनमें कभी
क्षोभ नहीं होता तथा वह सदा ज्ञानानन्दसे तृप्त एवं प्रसन्न रहता है ।। १३-१४ ।।
अभयं यस्य भूतेभ्यः सर्वेषामभयं यतः ।
नमस्यः सर्वभूतानां दान्तो भवति बुद्धिमान् ।। १५ ।।
जो समस्त प्राणियोंसे निर्भय है तथा जिससे सम्पूर्ण प्राणी निर्भय हो गये हैं, वह
दमनशील एवं बुद्धिमान् पुरुष सब जीवोंके लिये वन्दनीय होता है ।। १५ ।।
न हृष्यति महत्यर्थे व्यसने च न शोचति ।
स वै परिमितप्रज्ञः स दान्तो द्विज उच्यते ।। १६ ।।
जो बहुत बड़ी सम्पत्ति पाकर हर्षसे फूल नहीं उठता और संकटमें पड़नेपर शोक नहीं
करता, वह द्विज सूक्ष्म बुद्धिसे युक्त एवं जितेन्द्रिय कहलाता है ।। १६ ।।
कर्मभिः श्रुतिसम्पन्नः सद्भिराचरितैः शुचिः ।
सदैव दमसंयुक्तस्तस्य भुङ्क्ते महाफलम् ।। १७ ।।
जो वेदशास्त्रोंका ज्ञाता और सत्पुरुषोंद्वारा आचरणमें लाये हुए शुभ कर्मोंसे पवित्र है
तथा जिसने सदा ही दमका पालन किया है, वह अपने शुभकर्मका महान् फल भोगता
है ।। १७ ।।
अनसूया क्षमा शान्तिः संतोषः प्रियवादिता ।
सत्यं दानमनायासो नैष मार्गो दुरात्मनाम् ।। १८ ।।
किसीके दोष न देखना, हृदयमें क्षमाभाव रखना, शान्ति, संतोष, मीठे वचन बोलना,
सत्य, दान तथा क्रियामें परिश्रमका बोध न होना—से सद्गुण हैं। दुरात्मा पुरुष इस मार्गसे
नहीं चलते हैं ।। १८ ।।
कामक्रोधौ च लोभश्च परस्येष्यांविकत्थना ।
कामक्रोधौ वशे कृत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।। १९ ।।
विक्रम्य घोरे तपसि ब्राह्मणः संशितव्रतः ।
कालाकाङ्क्षी चरेल्लोकान् निरपाय इवात्मवान् ।। २० ।।
उनमें तो काम, क्रोध, लोभ, दूसरोंके प्रति डाह और अपनी झूठी प्रशंसा आदि दुर्गुण ही भरे रहते हैं; इसलिये उत्तम एवं कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मणको चाहिये कि वह जितेन्द्रिय होकर काम और क्रोधको वशमें करे तथा ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक उत्साहके साथ घोर तपस्यामें संलग्न हो जाय एवं मृत्युकालकी प्रतीक्षा करता हुआ विघ्न-बाधाओंसे रहित हो धैर्यपूर्वक सम्पूर्ण जगत्में विचरे ॥ १९-२० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि दमप्रशंसायां विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२० ॥ इस प्रकार श्रीमद्भारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें दमकी प्रशंसाविषयक दो सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२० ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १०८ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १२८ १/३ श्लोक हैं)
* 'चष्टे इति चक्षुः'—जो देखता है, वह चक्षु है। इस व्युत्पत्तिका अनुसार सर्वद्रष्टा परमात्मा ही चक्षुः पदका वाच्यार्थ है।
२२१-
एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
व्रत, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा अतिथिसेवा आदिका विवेचन तथा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करनेवालेको परम उत्तम गतिकी प्राप्तिका कथन
युधिष्ठिर उवाच
द्विजातयो व्रतोपेता यदिदं भुञ्जते हविः ।
अन्नं ब्राह्मणकामाय कथमेतत् पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! व्रतयुक्त द्विजगण वेदोक्त सकामकर्मोंके फलकी इच्छासे हविष्यान्नका भोजन करते हैं, उनका यह काय उचित है या नहीं? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अवेदोक्तव्रतोपेता भुञ्जानाः कार्यकारिणः ।
वेदोक्तेषु च भुञ्जाना व्रतलुब्धा युधिष्ठिर ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! जो लोग अवैदिक व्रतका आश्रय ले हविष्यान्नका भोजन करते हैं, वे स्वेच्छाचारी हैं और जो वेदोक्त व्रतोंमें प्रवृत्त हो सकाम यज्ञ करते और उसमें खाते हैं, वे भी उस व्रतके फलोंके प्रति लोलुप कहे जाते हैं (अतः उन्हें भी बारंबार इस संसारमें आना पड़ता है) ॥ २ ॥
युधिष्ठिर उवाच
यदिदं तप इत्याहुरुपवासं पृथग्जनाः ।
एतत् तपो महाराज उताहो किं तपो भवेत् ॥ ३ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**महाराज! संसारके साधारण लोग जो उपवासको ही तप कहते हैं, क्या वास्तवमें यही तप है या दूसरा। यदि दूसरा है तो उस तपका क्या स्वरूप है? ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
मासपक्षोपवासेन मन्यन्ते यत् तपो जनाः ।
आत्मतन्त्रोपघातस्तु न तपस्तत्सतां मतम् ॥ ४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! साधारण जन जो महीने-पंद्रह दिन उपवास करके उसे तप मानते हैं, उनका वह कार्य धर्मके साधनभूत शरीरका शोषण करनेवाला है; अतः श्रेष्ठ पुरुषोंके मतमें वह तप नहीं है ॥ ४ ॥
त्यागश्च संनतिश्चैव शिष्यते तप उत्तमम् ।
सदोपवासी च भवेद् ब्रह्मचारी सदा भवेत् ॥ ५ ॥
उनके मतमें तो त्याग और विनय ही उत्तम तप है। इनका पालन करनेवाला मनुष्य नित्य उपवासी और सदा ब्रह्मचारी है ।। ५ ।।
मुनिश्च स्यात् सदा विप्रो दैवतं च सदा भवेत् ।
कुटुम्बिको धर्मकामः सदास्वप्रश्च भारत ।। ६ ।।
भरतनन्दन! त्यागी और विनयी ब्राह्मण सदा मुनि और सर्वदा देवता समझा जाता है। वह कुटुम्बके साथ रहकर भी निरन्तर धर्मपालनकी इच्छा रखे और निद्रा तथा आलस्यको कभी पास न आने दे ।। ६ ।।
अमांसादी सदा च स्यात् पवित्रश्च सदा भवेत् ।
अमृताशी सदा च स्याद् देवतातिथिपूजकः ।। ७ ।।
मांस कभी न खाय, सदा पवित्र रहे, वैश्वदेव आदि यज्ञसे बचे हुए अमृतमय अन्नका भोजन तथा देवता और अतिथियोंकी पूजा करे ।। ७ ।।
विघसाशी सदा च स्यात् सदा चैवातिथिव्रतः ।
श्रद्दधानः सदा च स्याद् देवताद्विजपूजकः ।। ८ ।।
उसे सदा यज्ञशिष्ट अन्नका भोक्ता, अतिथिसेवाका व्रती, श्रद्धालु तथा देवता और ब्राह्मणोंका पूजक होना चाहिये ।। ८ ।।
युधिष्ठिर उवाच
कथं सदोपवासी स्याद् ब्रह्मचारी कथं भवेत् ।
विघसाशी कथं च स्यात् सदा चैवातिथिव्रतः ।। ९ ।।
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! मनुष्य नित्य उपवास करनेवाला कैसे हो सकता है? वह सतत ब्रह्मचारी कैसे रह सकता है? वह किस प्रकार अन्न ग्रहण करे, जिससे सदा यज्ञशिष्ट अन्नका भोक्ता हो सके तथा वह निरन्तर अतिथिसेवाका व्रत भी कैसे निभा सकता है? ।। ९ ।।
भीष्म उवाच
अन्तरा प्रातराशं च सायमाशं तथैव च ।
सदोपवासी स भवेद् यो न भुङ्क्तेऽन्तरा पुनः ।। १० ।।
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! जो प्रतिदिन प्रातःकालके सिवा फिर शामको ही भोजन करे और बीचमें कुछ न खाय, वह नित्य उपवास करनेवाला होता है ।। १० ।।
भार्यां गच्छन् ब्रह्मचारी ऋतौ भवति वै द्विजः ।
ऋतवादी भवेन्नित्यं ज्ञाननित्यश्च यो नरः ।। ११ ।।
जो द्विज केवल ऋतुस्नानके समय ही पत्नीके साथ समागम करता, सदा सत्य बोलता और नित्य ज्ञानमें स्थित रहता है, वह सदा ब्रह्मचारी ही होता है ।। ११ ।।
न भक्षयेत् तथा मांसममांसाशी भवत्यपि ।
दाननित्यः पवित्रश्च अस्वप्रश्च दिवाऽस्वपन् ॥ १२ ॥ तथा जो कभी मांस न खाय, वह अमांसाहारी होता है। जो नित्य दान करनेवाला है, वह पवित्र माना जाता है। जो दिनमें कभी नहीं सोता, वह सदा जागनेवाला समझा जाता है ॥ १२ ॥
भृत्यातिथिषु यो भुङ्क्ते भुक्तवत्सु सदा सदा । अमृतं केवलं भुङ्क्ते इति विद्धि युधिष्ठिर ॥ १३ ॥ युधिष्ठिर! जो सदा भरण-पोषण करनेके योग्य पिता-माता आदि कुटुम्बीजनों, सेवकों तथा अतिथियोंके भोजन कर लेनेपर ही खाता है, वह केवल अमृत भोजन करता है; ऐसा समझो ॥ १३ ॥
(अदत्त्वा योऽतिथिभ्योऽन्नं न भुङ्क्ते सोऽतिथिप्रियः । अदत्त्वान्नं दैवतेभ्यो यो न भुङ्क्ते स दैवतम् ॥) जो अतिथियोंको अन्न दिये बिना स्वयं भी नहीं खाता, वह अतिथिप्रिय है तथा जो देवताओंको अन्न दिये बिना भोजन नहीं करता, वह देवभक्त है ॥
अभुक्तवत्सु नाश्नानः सततं यस्तु वै द्विजः । अभोजनेन तेनास्य जितः स्वर्गो भवत्युत ॥ १४ ॥ जो द्विज भृत्यों और अतिथियोंके भोजन न करनेपर स्वयं भी कभी अन्न ग्रहण नहीं करता, वह भोजन न करनेके उस पुण्यसे स्वर्गलोकपर विजय पा लेता है ॥ १४ ॥
देवताभ्यः पितृभ्यश्च भृत्येभ्योऽतिथिभिः सह । अवशिष्टं तु योऽश्नाति तमाहुर्विघसाशिनम् ॥ १५ ॥ देवगण, पितृगण, माता-पिता तथा अतिथियों-सहित भृत्यवर्गसे अवशिष्ट अन्नको ही जो भोजन करता है, उसे विघसाशी (यज्ञशिष्ट अन्नका भोक्ता कहते हैं ॥ १५ ॥
तेषां लोका ह्यपर्यन्ताः सदने ब्रह्मणा सह । उपस्थिताश्चाप्सरोभिः परियान्ति दिवौकसः ॥ १६ ॥ ऐसे पुरुषोंको अक्षयलोक प्राप्त होते हैं। ब्रह्माजी तथा अप्सराओंसहित समस्त देवता उनके घरपर आकर उनकी परिक्रमा किया करते हैं ॥ १६ ॥
देवताभिश्च ये सार्धं पितृभिश्चोपभुञ्जते । रमन्ते पुत्रपौत्रैश्च तेषां गतिरनुत्तमा ॥ १७ ॥ जो देवताओं और पितरोंके साथ (अर्थात् उन्हें उनका भाग अर्पण करके) भोजन करते हैं, वे इस लोकमें पुत्र-पौत्रोंके साथ रहकर आनन्द भोगते हैं और परलोकमें भी उन्हें परम उत्तम गति प्राप्त होती है ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अमृतप्राशनिको नाम एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें अमृतभोजन-सम्बन्धी दो सौ
इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १८ श्लोकः हैं)