भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1434, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1434

सकता। परंतु आप तो इनमें कोई नियत सम्बन्ध ही नहीं मानते हैं, अतः आपका कथन प्रसिद्धिके विपरीत है॥

श्वेतकेतुरुवाच
न विकूलोऽत्र कथितो नाकाशं हि विना जगत्।
सम्बन्धस्तत्र नास्त्येव तद्वदित्येष मन्यताम्॥
**श्वेतकेतुने कहा—**मैंने प्रसिद्धिके विपरीत कुछ नहीं कहा है। देखो, आकाशके बिना पृथ्वी अथवा पार्थिव जगत् टिक नहीं सकता तथापि इनमें कोई नित्य सम्बन्ध नहीं है। शब्द और अर्थका सम्बन्ध भी वैसा ही मानना चाहिये॥

सुवर्चलोवाच
सदाहङ्कारशब्दोऽयं व्यक्तमात्मनि संश्रितः।
न वाचस्तत्र वर्तन्ते इति मिथ्या भविष्यति॥
**सुवर्चला बोली—**यह 'अहम्' शब्द सदा ही आत्माके अर्थमें स्पष्टरूपसे प्रयुक्त होता है; परंतु 'यतो वाचो निवर्तन्ते' इस श्रुतिके अनुसार वहाँ वाणीकी पहुँच नहीं है; अतः आत्माके लिये 'अहम्' पदका प्रयोग भी मिथ्या ही होगा॥

श्वेतकेतुरुवाच
अहंशब्दो ह्यहंभावो नात्मभावे शुभव्रते।
न वर्तते परेऽचिन्त्ये वाचः सगुणलक्षणाः॥
**श्वेतकेतुने कहा—**शुभव्रते! अहम् शब्दका आत्म-भावमें प्रयोग नहीं होता; किंतु अहम् भावका ही आत्म-भावमें प्रयोग होता है; क्योंकि सगुण पदार्थके बोधक वचन अचिन्त्य परब्रह्म परमात्माका बोध करानेमें असमर्थ हैं॥
मृण्मये हि घटे भावस्ताद्ग्भाव इहेष्यते।
अयं भावः परेऽचिन्त्ये ह्यात्मभावो यथा च तत्॥
जैसे मिट्टीके घड़ेमें मृत्तिका-भाव होता है, उसी प्रकार परमात्मासे उत्पन्न हुए प्रत्येक पदार्थमें परमात्मभाव अभीष्ट है; अतएव अचिन्त्य परब्रह्म परमात्मामें अहम् भाव ही आत्मभाव है और वही यथार्थ है॥
अहं त्वमेतदित्येव परे संकल्पना मया।
तस्माद् वाचो न वर्तन्त इति नैव विरुध्यते॥
'मैं', 'तुम' और 'यह'—ये सब नाम परब्रह्म परमात्मामें हमलोगोंद्वारा कल्पित हैं (वास्तविक नहीं है), अतः 'उस परमात्मातक वाणीकी पहुँच नहीं हो पाती' श्रुतिके इस कथनसे कोई विरोध नहीं है॥
तस्माद् वामेन वर्तन्ते मनसा भीरु सर्वशः।