महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1435, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंयथाकाशगतं विश्वं संसक्तमिव लक्ष्यते ।। अतएव भीरु! मनुष्य भ्रान्तचित्तद्वारा ही अहम् आदि पदोंका प्रयोग करता है। जैसे आकाशमें स्थित सम्पूर्ण विश्व उसमें सटा हुआ-सा दीखता है, उसी प्रकार परमात्मामें स्थित हुआ सारा दृश्य-प्रपंच उससे जुड़ा हुआ-सा जान पड़ता है ।। संसर्गे सति सम्बन्धात् तद् विकारं भविष्यति । अनाकाशगतं सर्वं विकारे च सदा गतम् ।। ब्रह्मके साथ जगत्का जो सम्बन्ध है, उसी सम्बन्धसे यह उसीका कार्य जान पड़ता है। जैसे सारा जगत् आकाशसे पृथक् है तो भी उसके विकारोंसे सम्बन्ध होनेके कारण सदा उससे मिश्रित ही रहता है, उसी प्रकार जगत्से ब्रह्मका कोई सम्पर्क नहीं है तो भी यह उसीसे उत्पन्न होनेके कारण तद्रूप माना जाता है ।। तद् ब्रह्म परमं शुद्धमनौपम्यं न शक्यते । न दृश्यते तथा तच्च दृश्यते च मतिर्मम ।। वह ब्रह्म परम शुद्ध और उपमारहित है; अतः वाणी-द्वारा उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। इन चर्मचक्षुओंसे उसको नहीं देखा जा सकता है तथा ज्ञानदृष्टिसे उसका साक्षात्कार होता है, ऐसा मेरा मत है ।।
सुवर्चलोवाच
निर्विकारं ह्यमूर्त्तिं च निरयं सर्वगं तथा । दृश्यते च वियन्नित्यं दृगात्मा तेन दृश्यते ।। **सुवर्चला बोली—**तब तो यह मानना होगा कि जिस प्रकार निर्विकार, निराकार, निःसीम और सर्वव्यापी आकाशका सर्वदा ही दर्शन होता है, उसीके समान ज्ञानस्वरूप आत्माका भी दर्शन होता है ।।
श्वेतकेतुरुवाच
त्वचा स्पृशति वै वायुमाकाशस्थं पुनः पुनः । तत्स्थं गन्धं तथाऽऽघ्राति ज्योतिः पश्यति चक्षुषा ।। **श्वेतकेतुने कहा—**मनुष्य त्वचाद्वारा आकाशमें स्थित वायुका बारंबार स्पर्श करता है, नासिकाद्वारा आकाशवर्ती गन्धको बारंबार सूँघता है और नेत्रद्वारा आकाशस्थित ज्योतिका दर्शन करता है ।। तमोरश्मिगणंश्चैव मेघजालं तथैव च । वर्षं तारागणं चैव नाकाशं दृश्यते पुनः ।। इसके सिवा अन्धकार, किरणसमूह, मेघोंकी घटा, वर्षा तथा तारागणका भी बारंबार दर्शन होता है; परंतु आकाश दृष्टिगोचर नहीं होता ।। आकाशस्याप्यथाकाशं सद्रूपमिति निश्चितम् ।