भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1436, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1436

तदर्थे कल्पिता ह्येते तत् सत्यो विष्णुरेव च ।।

सत्स्वरूप परमात्मा उस आकाशका भी आकाश है, अर्थात् उसे भी अवकाश

देनेवाला महाकाश है; यह निश्चित है, उन्हींके लिये और उन्हींके द्वारा इस सम्पूर्ण जगत्की

सृष्टि हुई है। वे ही सत्य तथा सर्वव्यापी हैं ।।

यानि नामानि गौणानि ह्युपचारात् परात्मनि ।

न चक्षुषा न मनसा न चान्येन परो विभुः ।।

चिन्त्यते सूक्ष्मया बुद्ध्या वाचा वक्तुं न शक्यते ।

भगवान्के जो गुण-सम्बन्धी नाम हैं, वे परमात्मामें औपचारिक हैं। नेत्र, मन तथा अन्य

किसी इन्द्रियके द्वारा भी उस सर्वव्यापी परमात्माका ग्रहण नहीं हो सकता। वाणीद्वारा भी

उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। केवल सूक्ष्म बुद्धिद्वारा उनका चिन्तन एवं साक्षात्कार

किया जा सकता है ।।

एतत् प्रपञ्चमखिलं तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ।

महाघटोऽल्पकश्चैव यथा मह्यां प्रतिष्ठितौ ।।

यह सारा प्रपंच (समष्टि एवं व्यष्टि-जगत्) उन्हीं परमात्मामें प्रतिष्ठित है। ठीक उसी

तरह, जैसे बड़ा और छोटा घड़ा पृथ्वीपर स्थित होते हैं ।।

न च स्त्री न पुमांश्चैव तथैव न नपुंसकः ।

केवलज्ञानमात्रं तत् तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ।।

वह परमात्मा न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है, केवल ज्ञानस्वरूप है। उसीके

आधारपर यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है ।।

भूमिसंस्थानयोगेन वस्तुसंस्थानयोगतः ।

रसभेदा यथा तोये प्रकृत्यामात्मनस्तथा ।।

जैसे एक ही जलमें मृत्तिकाविशेष एवं बीज आदि द्रव्यविशेषके संयोगसे रसभेद उत्पन्न

होते हैं, उसी प्रकार प्रकृति और आत्माके संयोगसे गुण-कर्मके अनुसार अनेक प्रकारकी

सृष्टि प्रकट होती है ।।

तद्वाक्यस्मरणान्नित्यं तृप्तिं वारि पिबन्निव ।

प्राप्नोति ज्ञानमखिलं तेन तत् सुखमेधते ।।

जैसे प्यासा मनुष्य पानी पीकर तृप्ति लाभ करता है, उसी प्रकार साधक ब्रह्मबोधक

वाक्यको स्मरण करके सदा तृप्ति एवं सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करता है और उस ज्ञानसे उसका

सुख उत्तरोत्तर अभ्युदयको प्राप्त होता है ।।

सुवर्चलोवाच

अनेन साध्यं किं स्याद् वै शब्देनेति मतिर्मम ।

वेदगम्यः परोऽचिन्त्य इति पौराणिका विदुः ।।

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