भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1437

निरर्थको यथा लोके तद्वत् स्यादिति मे मतिः ।

निरीक्ष्यैवं यथान्यायं वक्तुमर्हसि मेऽनघ ।।

सुवर्चला बोली—निष्पाप मुने! इस शब्दसे क्या सिद्ध होनेवाला है? मेरी तो ऐसी

धारणा है कि शब्दसे कुछ भी होने-जानेवाला नहीं है। परंतु पौराणिक विद्वान् ऐसा मानते हैं

कि परमात्मा अचिन्त्य एवं वेदगम्य हैं। जैसे लोकमें बहुत-से शब्द निरर्थक होते हैं, उसी

प्रकार वैदिक शब्द भी हो सकते हैं। मेरी बुद्धिमें तो यही बात आती है; अतः आप इस

विषयमें यथोचित विचार करके मुझे यथार्थ बात बतानेकी कृपा करें ।।

श्वेतकेतुरुवाच

वेदगम्यं परं शुद्धमिति सत्या परा श्रुतिः ।

व्याहत्या नैतदित्याह व्युपलिङ्गे च वर्तते ।।

श्वेतकेतुने कहा— 'शुद्धस्वरूप परब्रह्म परमात्मा वेदगम्य हैं' श्रुतिका यह कथन परम

सत्य है। इस विषयमें नास्तिकोंका कहना है कि परब्रह्मकी प्रत्यक्ष उपलब्धि न होनेसे उक्त

श्रुतिका कथन व्याघात दोषसे दूषित होनेके कारण सत्य नहीं है। इसका उत्तर आस्तिक यों

देते हैं कि सूक्ष्म शरीरविशिष्ट स्थूल देहमें जीवात्मारूपसे परब्रह्मकी ही उपलब्धि होती है;

अतः श्रुतिका पूर्वोक्त कथन यथार्थ ही है ।।

निरर्थको न चैवास्ति शब्दो लौकिक उत्तमे ।

अनन्वयास्तथा शब्दा निरर्था इति लौकिकैः ।।

उत्तम अंगोंवाली देवि! कोई लौकिक शब्द भी निरर्थक नहीं है; फिर वैदिक शब्द तो

व्यर्थ हो ही कैसे सकता है। जिन शब्दोंका परस्पर अन्वय नहीं होता—जो एक दूसरेसे

असम्बद्ध होते हैं, उन्हींको लौकिक पुरुष निरर्थक बताते हैं ।।

गृह्यन्ते तद्वदित्येव न वर्तन्ते परात्मनि ।

अगोचरत्वं वचसां युक्तमेवं तथा शुभे ।।

किंतु शुभे! लौकिक शब्दोंकी ही भाँति वैदिक शब्द भी यद्यपि सार्थक समझे जाते हैं,

तथापि वे साक्षात् परमात्माका बोध करानेमें असमर्थ हैं; क्योंकि परमात्माको वाणीका

अगोचर बताया गया है और उनकी अगोचरता युक्तिसंगत भी है ।।

साधनस्योपदेशाच्च ह्युपायस्य च सूचनात् ।

उपलक्षणयोगेन व्यावृत्या च प्रदर्शनात् ।।

वेदगम्यः परः शुद्ध इति मे धीयते मतिः ।

वेदोंमें ब्रह्मकी उपासना अथवा उसकी प्राप्तिके साधनका उपदेश है। उपासनाके उपाय

भी सूचित किये गये हैं। (जैसे ग्रहणकालमें चन्द्रमा और सूर्यके साथ राहुका दर्शन होता है

उसी प्रकार) उपलक्षण-योगसे प्रत्येक शरीरमें जीवात्मारूपसे ब्रह्मकी ही स्थितिका प्रदर्शन

किया गया है। इसके सिवा नेति-नेति आदि निषेधात्मक वचनोंद्वारा अनात्मवस्तुके