महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1438, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाधपूर्वक ब्रह्मके स्वरूपकी ओर संकेत किया गया है। इसलिये शुद्धस्वरूप परमात्मा एकमात्र वेदगम्य हैं, यही मेरी सुनिश्चित धारणा है ।।
अध्यात्मध्यानसम्भूतं भूतं दीपवत् स्फुटम् ।।
ज्ञाने विद्धि शुभाचारे तेन यान्ति परां गतिम् ।
शुभ आचरणोंवाली देवि! तुम्हें यह विदित हो कि अध्यात्मतत्त्वके चिन्तनसे नित्य-ज्ञान दीपककी भाँति स्पष्टरूपसे प्रकाशित होने लगता है। उस ज्ञानसे मनुष्य परमगतिको प्राप्त होते हैं ।।
यदि मे व्याहृतं गुह्यं श्रुतं न तु त्वया शुभे ।।
तथ्यमित्येव वा शुद्धे ज्ञानं ज्ञानविलोचने ।
शुभे! शुद्धस्वरूपे! ज्ञानदृष्टिसे सम्पन्न देवि! मैंने यह जो गूढ़ एवं यथार्थ ब्रह्मज्ञानका विषय बताया है, इसे तुमने सुना है या नहीं? ।।
नानारूपवदस्यैवमैश्वर्यं दृश्यते शुभे ।
न वायुस्तन्न सूर्यस्तन्नाग्निस्तत् तु परं पदम् ।।
अनेन पूर्णमेतद्धि हृदि भूतमिहेष्यते ।
शुभे! परब्रह्म परमात्माका ऐश्वर्य नाना रूपोंमें दिखायी देता है। वायुकी वहाँतक पहुँच नहीं है। सूर्य और अग्नि उस परमपदस्वरूप परमेश्वरको प्रकाशित नहीं कर सकते। परमात्मासे ही यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण है और वे ही प्रत्येक प्राणीके हृदयमें आत्मारूपसे निवास करते हैं ।।
एतावदात्मविज्ञानमेतावद् यदहं स्मृतम् ।।
आवयोर्न च सत्त्वे वै तस्मादज्ञानबन्धनम् ।
इतना ही परमात्मविज्ञान है। इतना ही अहम् पदार्थ माना गया है। हम दोनोंकी सत्ता नित्य नहीं है, ऐसी धारणा अज्ञानके कारण होती है ।।
भीष्म उवाच
एवं सुवर्चला हृष्टा प्रोक्ता भर्त्रा यथार्थवत् ।
परिचर्यमाणा ह्यनिशं तत्त्वबुद्धिसमन्विता ।।
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! अपने पति श्वेतकेतुके इस प्रकार यथार्थ उपदेश देनेपर सुवर्चला आनन्दमग्न हो गयी। वह निरन्तर तत्त्वज्ञाननिष्ठ रहकर तदनुरूप आचरण करने लगी ।।
भर्ता च तामनुप्रेक्ष्य नित्यनैमित्तिकान्वितः ।
परमात्मनि गोविन्दे वासुदेवे महात्मनि ।।
समाधाय च कर्माणि तन्मयत्वेन भावितः ।
कालेन महता राजन् प्राप्नोति परमां गतिम् ।।