भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1439, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1439

श्वेतकेतु पत्नीको साथ रखकर नित्य-नैमित्तिक कर्मोंमें संलग्न रहते थे। वे सबके हृदयमें निवास करनेवाले महामना परमात्मा गोविन्दको अपने समस्त कर्म समर्पित करके उन्हींके ध्यानमें तन्मय रहा करते थे। राजन्! इस प्रकार दीर्घकालतक परमात्मचिन्तन करके उन्होंने परमगति प्राप्त कर ली ।। एतत् ते कथितं राजन् यस्मात् त्वं परिपृच्छसि । गार्हस्थ्यं च समाधाय गतौ जायापती परम् ॥) नरेश्वर! तुमने जो प्रश्न किया था, उसके उत्तरमें मैंने यह प्रसंग सुनाया है। इस प्रकार वे दोनों पति-पत्नी गृहस्थधर्मका आश्रय लेकर परमात्माको प्राप्त हो गये ।।

युधिष्ठिर उवाच

किं कुर्वन् सुखमाप्नोति किं कुर्वन् दुःखमाप्नुयात् । किं कुर्वन्निर्भयो लोके सिद्धश्चरति भारत ॥ १ ॥ **युधिष्ठिरने पूछा—**भारत! मनुष्य क्या उपाय करनेसे सुख पाता है; क्या करनेसे दुःख उठाता है और कौन-सा काम करनेसे वह सिद्धकी भाँति संसारमें निर्भय होकर विचरता है ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

दममेव प्रशंसन्ति वृद्धाः श्रुतिसमाधयः । सर्वेषामेव वर्णानां ब्राह्मणस्य विशेषतः ॥ २ ॥ **भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! मनोयोगपूर्वक वेदार्थका विचार करनेवाले वृद्ध पुरुष सामान्यतः सभी वर्णोंके लिये और विशेषतः ब्राह्मणके लिये मन और इन्द्रियोंके संयमरूप 'दम' की ही प्रशंसा करते हैं ॥ २ ॥ नादान्तस्य क्रियासिद्धिर्यथावदुपपद्यते । क्रिया तपश्च सत्यं च दमे सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ३ ॥ जिसने दमका पालन नहीं किया है, उसे अपने कर्मोंमें यथोचित सफलता नहीं मिलती; क्योंकि क्रिया, तप और सत्य—ये सभी दमके आधारपर ही प्रतिष्ठित होते हैं ॥ ३ ॥ दमस्तेजो वर्धयति पवित्रं दम उच्यते । विपाप्मा निर्भयो दान्तः पुरुषो विन्दते महत् ॥ ४ ॥ 'दम' तेजकी वृद्धि करता है। 'दम' परम पवित्र बताया गया है, मन और इन्द्रियोंका संयम करनेवाला पुरुष पाप और भयसे रहित होकर 'महत्' पदको प्राप्त कर लेता है ॥ ४ ॥ सुखं दान्तः प्रस्वपिति सुखं च प्रतिबुद्ध्यते । सुखं लोके विपर्येति मनश्चास्य प्रसीदति ॥ ५ ॥