महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1440, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंदमका पालन करनेवाला मनुष्य सुखसे सोता, सुखसे जागता और सुखसे ही संसारमें विचरता है तथा उसका मन भी प्रसन्न रहता है ॥ ५ ॥
तेजो दमेन ध्रियते तन्न तीक्ष्णोऽधिगच्छति ।
अमित्रांश्च बहून् नित्यं पृथगात्मनि पश्यति ॥ ६ ॥
दमसे ही तेजको धारण किया जाता है, जिसमें दमका अभाव है, वह तीव्र कामवाला रजोगुणी पुरुष उस तेजको नहीं धारण कर सकता और सदा काम, क्रोध आदि बहुत-से शत्रुओंको अपनेसे पृथक् अनुभव करता है ॥ ६ ॥
क्रव्याद्भ्य इव भूतानामदान्तेभ्यः सदा भयम् ।
तेषां विप्रतिषेधार्थं राजा सृष्टः स्वयम्भुवा ॥ ७ ॥
जिन्होंने मन और इन्द्रियोंका दमन नहीं किया है, उनसे समस्त प्राणियोंको उसी प्रकार सदा भय बना रहता है, जैसे मांसभक्षी व्याघ्र आदि जन्तुओंसे भय हुआ करता है। ऐसे उद्दण्ड मनुष्योंकी उच्छृंखल प्रवृत्तिको रोकनेके लिये ही ब्रह्माजीने राजाकी सृष्टि की है ॥ ७ ॥
आश्रमेषु च सर्वेषु दम एव विशिष्यते ।
यच्च तेषु फलं धर्मे भूयो दान्ते तदुच्यते ॥ ८ ॥
चारों आश्रमोंमें दमको ही श्रेष्ठ बताया गया है। उन सब आश्रमोंमें धर्मका पालन करनेसे जो फल मिलता है, दमनशील पुरुषको वह फल और अधिक मात्रामें उपलब्ध होता है ॥ ८ ॥
तेषां लिङ्गानि वक्ष्यामि येषां समुदयो दमः ।
अकार्पण्यमसंरम्भः संतोषः श्रद्दधानता ॥ ९ ॥
अक्रोध आर्जवं नित्यं नातिवादोऽभिमानिता ।
गुरुपूजानसूया च दया भूतेष्वपैशुनम् ॥ १० ॥
जनवादमृषावादस्तुतिनिन्दाविवर्जनम् ।
साधुकामश्च स्पृहयेन्नायतिं प्रत्ययेषु च ॥ ११ ॥
अब मैं उन लक्षणोंका वर्णन करूँगा, जिनकी उत्पत्तिमें दम ही कारण है। कृपणताका अभाव, उत्तेजनाका न होना, संतोष, श्रद्धा, क्रोधका न आना, नित्य सरलता, अधिक बकवाद न करना, अभिमानका त्याग, गुरुसेवा, किसीके गुणोंमें दोषदृष्टि न करना, समस्त जीवोंपर दया करना, किसीकी चुगली न करना, लोकापवाद, असत्यभाषण तथा निन्दा-स्तुति आदिको त्याग देना, सत्पुरुषोंके संगकी इच्छा तथा भविष्यमें आनेवाले सुखकी स्पृहा और दुःखकी चिन्ता न करना— ॥ ९—११ ॥
अवैरकृत् सूपचारः समो निन्दाप्रशंसयोः ।
सुवृत्तः शीलसम्पन्नः प्रसन्नात्माऽऽत्मवान् प्रभुः ॥ १२ ॥
प्राप्य लोके च सत्कारं स्वर्गं वै प्रेत्य गच्छति ।