भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1441, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1441

जितेन्द्रिय पुरुष किसीके साथ वैर नहीं करता। उसका सबके साथ अच्छा बर्ताव होता

है। वह निन्दा और स्तुतिमें समान भाव रखनेवाला, सदाचारी, शीलवान्, प्रसन्नचित्त,

धैर्यवान् तथा दोषोंका दमन करनेमें समर्थ होता है। वह इहलोकमें सम्मान पाता और

मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें जाता है ।। १२ १/२ ।।

दुर्गमं सर्वभूतानां प्रापयन् मोदते सुखी ।। १३ ।।

सर्वभूतहिते युक्तो न स्म यो द्विषते जनम् ।

महाह्रद इवाक्षोभ्यः प्रज्ञातृप्तः प्रसीदति ।। १४ ।।

दमनशील पुरुष समस्त प्राणियोंको दुर्लभ वस्तुएँ देकर—दूसरोंको सुख पहुँचाकर

स्वयं सुखी और प्रमुदित होता है। जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें लगा रहता और किसीसे

द्वेष नहीं करता है, वह बहुत बड़े जलाशयकी भाँति गम्भीर होता है। उसके मनमें कभी

क्षोभ नहीं होता तथा वह सदा ज्ञानानन्दसे तृप्त एवं प्रसन्न रहता है ।। १३-१४ ।।

अभयं यस्य भूतेभ्यः सर्वेषामभयं यतः ।

नमस्यः सर्वभूतानां दान्तो भवति बुद्धिमान् ।। १५ ।।

जो समस्त प्राणियोंसे निर्भय है तथा जिससे सम्पूर्ण प्राणी निर्भय हो गये हैं, वह

दमनशील एवं बुद्धिमान् पुरुष सब जीवोंके लिये वन्दनीय होता है ।। १५ ।।

न हृष्यति महत्यर्थे व्यसने च न शोचति ।

स वै परिमितप्रज्ञः स दान्तो द्विज उच्यते ।। १६ ।।

जो बहुत बड़ी सम्पत्ति पाकर हर्षसे फूल नहीं उठता और संकटमें पड़नेपर शोक नहीं

करता, वह द्विज सूक्ष्म बुद्धिसे युक्त एवं जितेन्द्रिय कहलाता है ।। १६ ।।

कर्मभिः श्रुतिसम्पन्नः सद्भिराचरितैः शुचिः ।

सदैव दमसंयुक्तस्तस्य भुङ्क्ते महाफलम् ।। १७ ।।

जो वेदशास्त्रोंका ज्ञाता और सत्पुरुषोंद्वारा आचरणमें लाये हुए शुभ कर्मोंसे पवित्र है

तथा जिसने सदा ही दमका पालन किया है, वह अपने शुभकर्मका महान् फल भोगता

है ।। १७ ।।

अनसूया क्षमा शान्तिः संतोषः प्रियवादिता ।

सत्यं दानमनायासो नैष मार्गो दुरात्मनाम् ।। १८ ।।

किसीके दोष न देखना, हृदयमें क्षमाभाव रखना, शान्ति, संतोष, मीठे वचन बोलना,

सत्य, दान तथा क्रियामें परिश्रमका बोध न होना—से सद्गुण हैं। दुरात्मा पुरुष इस मार्गसे

नहीं चलते हैं ।। १८ ।।

कामक्रोधौ च लोभश्च परस्येष्यांविकत्थना ।

कामक्रोधौ वशे कृत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।। १९ ।।

विक्रम्य घोरे तपसि ब्राह्मणः संशितव्रतः ।

कालाकाङ्क्षी चरेल्लोकान् निरपाय इवात्मवान् ।। २० ।।

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