महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1433, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंस शब्द इति विज्ञेयस्तन्निपातोऽर्थ उच्यते ॥
**श्वेतकेतुने कहा—**अकार आदि वर्णोंके समुदायको क्रम या व्यतिक्रमसे उच्चारण करनेपर जो वस्तु प्रकाशित होती है, उसे ‘शब्द’ जानना चाहिये और उस शब्दसे जिस अभिप्रायकी प्रतीति हो, उसका नाम ‘अर्थ’ है ॥
सुवर्चलोवाच
शब्दार्थयोर्हि सम्बन्धस्त्वनयोरस्ति वा न वा ।
तन्मे ब्रूहि यथातत्त्वं शब्दस्थानेऽर्थ एव चेत् ॥
**सुवर्चला बोली—**यदि शब्दके होनेपर ही अर्थकी प्रतीति होती है तो इन शब्द और अर्थमें कोई सम्बन्ध है या नहीं? यह आप मुझे यथार्थरूपसे बतावें ॥
श्वेतकेतुरुवाच
शब्दार्थयोर्न चैवास्ति सम्बन्धोऽत्यन्त एव हि ।
पुष्करे च यथा तोयं तथास्तीति च वेत्थ तत् ॥
**श्वेतकेतुने कहा—**शब्द और अर्थमें एक प्रकारसे कोई नियत सम्बन्ध नहीं है। कमलके पत्तेपर स्थित जलकी भाँति शब्द एवं अर्थका अनियत सम्बन्ध है, ऐसा जानो ॥
सुवर्चलोवाच
अर्थे स्थितिर्हि शब्दस्य नान्यथा च स्थितिर्भवेत् ।
विद्यते चेन्महाप्राज्ञ विनार्थं ब्रूहि सत्तम ॥
**सुवर्चला बोली—**महाप्राज्ञ! अर्थपर ही शब्दकी स्थिति है, अन्यथा उसकी स्थिति नहीं हो सकती। साधु-शिरोमणे! यदि बिना अर्थका कोई शब्द हो तो उसे बताइये ॥
श्वेतकेतुरुवाच
स संसर्गोऽतिमात्रस्तु वाचकत्वेन वर्तते ।
अस्ति चेद् वर्तते नित्यं विकारोच्चारणेन वै ॥
**श्वेतकेतुने कहा—**अर्थके साथ शब्दका वाचकत्वरूप सम्बन्ध है और वह सम्बन्ध नित्य है। यदि शब्द है तो उसका अर्थ भी सदा है ही। विपरीत क्रमसे उच्चारण करनेपर भी शब्दका कुछ-न-कुछ अर्थ होता ही है (जैसे नदी, दीन इत्यादि) ॥
सुवर्चलोवाच
शब्दस्थानोऽत्र इत्युक्तस्तथार्थ इति मे कृतम् ।
अर्थास्थितो न तिष्ठेच्च विरूढमिह भाषितम् ॥
**सुवर्चला बोली—**शब्द अर्थात् वेदका आधार है अर्थभूत परमात्मा। ऐसा ही विद्वानोंने कहा है और यही मेरा भी मत है। उस अर्थका आधार लिये बिना तो शब्द टिक ही नहीं