महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1431, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामगोत्रसमायुक्तमात्मानं मन्यसे यदि । तन्मिथ्या गोत्रसद्भावे वर्तते देहबन्धनम् ॥
यह सुनकर श्वेतकेतुने उससे कहा—'भामिनि! वह तो कुछ कहेगा नहीं। यदि तुम आत्माको नाम और गोत्रसे युक्त मानती हो तो यह तुम्हारी मिथ्या धारणा है; क्योंकि नाम-गोत्र होनेपर देहका बन्धन प्राप्त होता है ।।
अहमित्येष भावोऽत्र त्वयि चापि समाहितः । त्वमप्यहमहं सर्वमहमित्येव वर्तते ॥ नात्र तत् परमार्थं वै किमर्थमनुपृच्छसि ॥
'आत्मामें अहम् (मैं हूँ) यह भाव स्थापित किया गया है। तुममें भी वही भाव है। तुम भी अहम्, मैं भी अहम् और यह सब अहम्का ही रूप है। इसमें वह परमार्थतत्त्व नहीं है; फिर किसलिये पूछती हो?' ।।
ततः प्रहस्य सा हृष्टा भर्तारं धर्मचारिणी । उवाच वचनं काले स्मयमाना तदा नृप ॥
नरेश्वर! तब धर्मचारिणी पत्नी सुवर्चला बहुत प्रसन्न हुई, उसने हँसकर मुस्कराते हुए यह समयोचित वचन कहा ।।
सुवर्चलोवाच
किमनेकप्रकारेण विरोधेन प्रयोजनम् । क्रियाकलापैर्ब्रह्मर्षे ज्ञाननष्टोऽसि सर्वदा ॥ तन्मे ब्रूहि महाप्राज्ञ यथाहं त्वामनुव्रता ॥
सुवर्चला बोली—ब्रह्मर्षे! अनेक प्रकारके विरोधसे क्या प्रयोजन? सदा इस नाना प्रकारके क्रिया-कलापमें पड़कर आपका ज्ञान लुप्त होता जा रहा है। अतः महाप्राज्ञ! आप मुझे इसका कारण बताइये, क्योंकि मैं आपका अनुसरण करनेवाली हूँ ।।
श्वेतकेतुरुवाच
यद् यदाचरति श्रेष्ठः तत् तदेवेतरो जनः । वर्तते तेन लोकोऽयं संकीर्णश्च भविष्यति ॥
श्वेतकेतुने कहा—प्रिये! श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, वही दूसरे लोग भी करते हैं; अतः हमारे कर्म त्याग देनेसे यह सारा जनसमुदाय संकरताके दोषसे दूषित हो जायगा ।।
संकीर्णे च तथा धर्मे वर्णसंकरमेति च । संकरे च प्रवृत्ते तु मात्स्यो न्यायः प्रवर्तते ॥
इस प्रकार धर्ममें संकीर्णता आनेपर प्रजामें वर्ण-संकरता फैल जाती है और संकरता फैल जानेपर सर्वत्र मात्स्यन्यायकी प्रवृत्ति हो जाती है (जैसे प्रबल मत्स्य दुर्बल मत्स्यको