भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1430

यद् यदाचरति श्रेष्ठः तत् तदेवेतरो जनः ।।
तस्माल्लोकस्य सिद्ध्यर्थं कर्तव्यं चात्मसिद्धये ।।
तदनन्तर 'ये सब कर्म मेरे नहीं हैं और मैं इनका कर्ता नहीं हूँ' इस भावसे ज्ञानाग्निद्वारा उन सब कर्मोंको भस्म कर डालो, तुम परम सौभाग्यवती हो। तुम्हें सदा इसी तरह ममता और अहंकारसे रहित होकर कर्म करना चाहिये और मुझे भी ऐसा ही करना चाहिये। श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है वैसे ही दूसरे लोग भी करते हैं, अतः लोकव्यवहारकी सिद्धि तथा आत्मकल्याणके लिये हम दोनोंको कर्मोंका अनुष्ठान करते रहना चाहिये ।।

भीष्म उवाच

उक्त्वैवं स महाप्राज्ञः सर्वज्ञानैकभाजनः ।
पुत्रानुत्पाद्य तस्यां च यज्ञैः संतर्प्य देवताः ।।
आत्मयोगपरो नित्यं निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ।
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! ऐसा उपदेश देकर सम्पूर्ण ज्ञानके एकमात्र निधि महाज्ञानी श्वेतकेतुने सुवर्चलाके गर्भसे अनेक पुत्र उत्पन्न किये। यज्ञोंद्वारा देवताओंको संतुष्ट किया; फिर आत्मयोगमें नित्य तत्पर रहकर वे निर्द्वन्द्व एवं परिग्रहशून्य हो गये ।।

भार्यां तां सदृशीं प्राप्य बुद्धिं क्षेत्रज्ञयोरिव ।
लोकमन्यमनुप्राप्तौ भार्या भर्ता तथैव च ।।
साक्षिभूतौ जगत्यस्मिंश्चरमाणौ मुदान्वितौ ।
अपने अनुरूप पत्नीको पाकर श्वेतकेतु उसी प्रकार सुशोभित होते थे, जैसे बुद्धिको पाकर क्षेत्रज्ञ। वे दोनों पति-पत्नी लोकान्तरमें भी पहुँच जाते थे और इस जगत्में साक्षीकी भाँति स्थित होकर प्रसन्नतापूर्वक विचरते थे ।।

ततः कदाचिद् भर्तारं श्वेतकेतुं सुवर्चला ।
पप्रच्छ को भवानत्र ब्रूहि मे तद् द्विजोत्तम ।
तामाह भगवान् वाग्मी त्वया ज्ञातो न संशयः ।।
द्विजोत्तमेति मामुक्त्वा पुनः कमनुपृच्छसि ।
तदनन्तर एक दिन सुवर्चलाने अपने पति श्वेतकेतुसे पूछा—'द्विजश्रेष्ठ! आप कौन हैं, यह मुझे बताइये!' उस समय प्रवचन-कुशल भगवान् श्वेतकेतुने उससे कहा—'देवि! तुमने मेरे विषयमें जान ही लिया है, इसमें संदेह नहीं है। तुमने द्विजश्रेष्ठ कहकर मुझे सम्बोधित भी किया है; फिर उस द्विजश्रेष्ठके सिवा और किसको पूछ रही हो?' ।।

सा तमाह महात्मानं पृच्छामि हृदि शायिनम् ।।
तब सुवर्चलाने अपने महात्मा पतिसे कहा—'नाथ! मैं हृदय-गुफामें शयन करनेवाले आत्माको पूछती हूँ' ।।

तच्छ्रुत्वा प्रत्युवाचैनां स न वक्ष्यति भामिनि ।