महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो कालके द्वारा दग्ध हो चुका है, उसीको पीछेसे आग जलाती है। जिसे कालने पहलेसे ही मार डाला है, वही किसी दूसरेके द्वारा मारा जाता है। जो पहलेसे ही नष्ट हो चुकी है, वही वस्तु किसीके द्वारा नष्ट की जाती है तथा जिसका मिलना पहलेसे ही निश्चित है, उसीको मनुष्य हस्तगत करता है ।। २० ।। नास्य द्वीपः कुतः पारो नावारः सम्प्रदृश्यते । नान्तमस्य प्रपश्यामि विधेर्दिव्यस्य चिन्तयन् ।। २१ ।। मैं बहुत सोचनेपर भी दिव्य विधाता कालका अन्त नहीं देख पाता हूँ। उस समुद्र-जैसे कालका कहीं द्वीप भी नहीं है, फिर पार कहाँसे प्राप्त हो सकता है? उसका आर-पार कहीं नहीं दिखायी देता है ।। २१ ।। यदि मे पश्यतः कालो भूतानि न विनाशयेत् । स्यान्मे हर्षश्च दर्पश्च क्रोधश्चैव शचीपते ।। २२ ।। शचीपते! यदि काल मेरे देखते-देखते समस्त प्राणियोंका विनाश नहीं करता तो मुझे हर्ष होता, अपनी शक्तिपर गर्व होता और उस क्रूर कालपर मुझे क्रोध भी होता ।। २२ ।। तुषभक्षं तु मां ज्ञात्वा प्रविविक्तजने गृहे । बिभ्रतं गार्दभं रूपमागत्य परिगर्हसे ।। २३ ।। इस एकान्त गृहमें गर्दभका रूप धारण किये मुझे भूसी खाता जानकर तुम यहाँ आये हो और मेरी निन्दा करते हो ।। २३ ।। इच्छन्नहं विकुर्यां हि रूपाणि बहुधाऽऽत्मनः । विभीषणानि यानीक्ष्य पलायेथास्त्वमेव मे ।। २४ ।। मैं चाहूँ तो अपने बहुत-से ऐसे भयानक रूप प्रकट कर सकता हूँ, जिन्हें देखकर तुम्हीं मेरे निकटसे भाग खड़े होओगे ।। २४ ।। कालः सर्वं समादत्ते कालः सर्वं प्रयच्छति । कालेन विहितं सर्वं मा कृथाः शक्र पौरुषम् ।। २५ ।। इन्द्र! काल ही सबको ग्रहण करता है, काल ही सब कुछ देता है तथा कालने ही सब कुछ किया है; अतः अपने पुरुषार्थका गर्व न करो ।। २५ ।। पुरा सर्वं प्रव्यथितं मयि क्रुद्धे पुरंदर । अवैमि त्वस्य लोकस्य धर्मं शक्र सनातनम् ।। २६ ।। पुरन्दर! पूर्वकालमें मेरे कुपित होनेपर सारा जगत् व्यथित हो उठता था। इस लोककी कभी वृद्धि होती है और कभी ह्रास। यह इसका सनातन स्वभाव है। शक्र! इस बातको मैं अच्छी तरह जानता हूँ ।। २६ ।। त्वमप्येवमवेक्षस्व माऽऽत्मना विस्मयं गमः । प्रभवश्च प्रभावश्च नात्मसंस्थः कदाचन ।। २७ ।।