महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1470, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतुम भी जगत्को इसी दृष्टिसे देखो। अपने मनमें विस्मित न होओ। प्रभुता और प्रभाव अपने अधीन नहीं हैं ॥ २७ ॥
कौमारमेव ते चित्तं तथैवाद्य यथा पुरा । समवेक्षस्व मघवन् बुद्धिं विन्दस्व नैष्ठिकीम् ॥ २८ ॥
तुम्हारा चित्त अभी बालकके समान है। वह जैसा पहले था, वैसा ही आज भी है। मघवन्! इस बातकी ओर दृष्टिपात करो और नैष्ठिक बुद्धि प्राप्त करो ॥ २८ ॥
देवा मनुष्याः पितरो गन्धर्वोरगराक्षसाः । आसन् सर्वे मम वशे तत् सर्वं वेत्थ वासव ॥ २९ ॥
वासव! एक दिन देवता, मनुष्य, पितर, गन्धर्व, नाग और राक्षस—ये सभी मेरे अधीन थे। वह सब कुछ तुम जानते हो ॥ २९ ॥
नमस्तस्यै दिशेऽप्यस्तु यस्यां वैरोचनो बलिः । इति मामभ्यपद्यन्त बुद्धिमात्सर्यमोहिताः ॥ ३० ॥
मेरे शत्रु अपने बुद्धिगत द्वेषसे मोहित होकर मेरी शरण ग्रहण करते हुए ऐसा कहा करते थे कि विरोचनकुमार बलि जिस दिशामें हों, उस दिशाको भी हमारा नमस्कार है ॥ ३० ॥
नाहं तदनुशोचामि नात्मभ्रंशं शचीपते । एवं मे निश्चिता बुद्धिः शास्तुस्तिष्ठाम्यहं वशे ॥ ३१ ॥
शचीपते! मुझे अपने इस पतनके लिये तनिक भी शोक नहीं होता है, मेरी बुद्धिका ऐसा निश्चय है कि मैं सदा सबके शासक ईश्वरके वशमें हूँ ॥ ३१ ॥
दृश्यते हि कुले जातो दर्शनीयः प्रतापवान् । दुःखं जीवन् सहामात्यो भवितव्यं हि तत् तथा ॥ ३२ ॥
एक उच्चकुलमें उत्पन्न हुआ दर्शनीय एवं प्रतापी पुरुष अपने मन्त्रियोंके साथ दुःखपूर्वक जीवन बिताता देखा जाता है, उसका वैसा ही भवितव्य था ॥ ३२ ॥
दौष्कुलेयस्तथा मूढो दुर्जातः शक्र दृश्यते । सुखं जीवन् सहामात्यो भवितव्यं हि तत् तथा ॥ ३३ ॥
इन्द्र! एक नीच कुलमें उत्पन्न हुआ मूढ़ मनुष्य जिसका जन्म दुराचारसे हुआ है, अपने मन्त्रियोंसहित सुखी जीवन बिताता देखा जाता है। उसकी भी वैसी ही होनहार समझनी चाहिये ॥ ३३ ॥
कल्याणी रूपसम्पन्ना दुर्भगा शक्र दृश्यते । अलक्षणा विरूपा च सुभगा दृश्यते परा ॥ ३४ ॥
शक्र! एक कल्याणमय आचार-विचार रखनेवाली सुरूपवती युवती विधवा हुई देखी जाती है और दूसरी कुलक्षणा और कुरूपा स्त्री सौभाग्यवती दिखायी देती है ॥ ३४ ॥
नैतदस्मत्कृतं शक्र नैतच्छक्र त्वया कृतम् ।