भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1471

यत् त्वमेवंगतो वज्रिन् यच्चाप्येवंगता वयम् ॥ ३५ ॥ वज्रधारी इन्द्र! आज तो तुम इस तरह समृद्धिशाली हो गये हो और हमलोग जो ऐसी अवस्थामें पहुँच गये हैं, यह न तो हमारा किया हुआ है और न तुमने ही कुछ किया है ॥ ३५ ॥ न कर्म भविताप्येतत् कृतं मम शतक्रतो । ऋद्धिर्वाऽप्यथवा नर्द्धिः पर्यायकृतमेव तत् ॥ ३६ ॥ शतक्रतो! इस समय मैं इस परिस्थितिमें हूँ और जो कर्म मेरे इस शरीरसे हो रहा है, यह सब मेरा किया हुआ नहीं है। समृद्धि और निर्धनता (प्रारब्धके अनुसार) बारी-बारीसे सबपर आती है ॥ ३६ ॥ पश्यामि त्वां विराजन्तं देवराजमवस्थितम् । श्रीमन्तं द्युतिमन्तं च गर्जमानं ममोपरि ॥ ३७ ॥ मैं देखता हूँ, इस समय तुम देवराजके पदपर प्रतिष्ठित हो। अपने कान्तिमान् और तेजस्वी स्वरूपसे विराज रहे हो और मेरे ऊपर बारंबार गर्जना करते हो ॥ एवं नैव न चेत् कालो मामाक्रम्य स्थितो भवेत् । पातयेयमहं त्वाद्य सवज्रमपि मुष्टिना ॥ ३८ ॥ परंतु यदि इस तरह काल मुझपर आक्रमण करके मेरे सिरपर सवार न होता तो मैं आज वज्र लिये होनेपर भी तुम्हें केवल मुक्केसे मारकर धरतीपर गिरा देता ॥ न तु विक्रमकालोऽयं शान्तिकालोऽयमागतः । कालः स्थापयते सर्वं कालः पचति वै तथा ॥ ३९ ॥ किंतु यह मेरे लिये पराक्रम प्रकट करनेका समय नहीं है; अपितु शान्त रहनेका समय आया है। काल ही सबको विभिन्न अवस्थाओंमें स्थापित करके सबका पालन करता है और काल ही सबको पकाता (क्षीण करता) है ॥ ३९ ॥ मां चेदभ्यागतः कालो दानवेश्वरपूजितम् । गर्जन्तं प्रतपन्तं च कमन्यं नागमिष्यति ॥ ४० ॥ एक दिन मैं दानवेश्वरोंद्वारा पूजित था और मैं भी गर्जता तथा अपना प्रताप सर्वत्र फैलाता था। जब मुझपर भी कालका आक्रमण हुआ है, तब दूसरे किसपर वह आक्रमण नहीं करेगा? ॥ ४० ॥ द्वादशानां तु भवतामादित्यानां महात्मनाम् । तेजांस्येकेन सर्वेषां देवराज धृतानि मे ॥ ४१ ॥ देवराज! तुमलोग जो बारह महात्मा आदित्य कहलाते हो, तुम सब लोगोंके तेज मैंने अकेले धारण कर रखे थे ॥ ४१ ॥ अहमेवोद्वहाम्यापो विसृजामि च वासव । तपामि चैव त्रैलोक्यं विद्योताम्यहमेव च ॥ ४२ ॥