महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1496, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतुम काम-भोगकी इच्छाको छोड़ो और राजलक्ष्मीके इस मदको त्याग दो। इस दशामें यदि तुम्हारे राज्यका नाश हो जाय तो तुम उस शोकको सह सकोगे ।। ६४ १/२ ।। शोककाले शुचो मा त्वं हर्षकाले च मा हृषः ।। ६५ ।। अतीतानागतं हित्वा प्रत्युत्पन्नेन वर्तय । तुम शोकका अवसर आनेपर शोक न करो और हर्षके समय हर्षित मत होओ। भूत और भविष्यकी चिन्ता छोड़कर वर्तमान कालमें जो वस्तु उपलब्ध हो, उसीसे जीवन-निर्वाह करो ।। ६५ १/२ ।। मां चेदभ्यागतः कालः सदा युक्तमतन्द्रितः ।। ६६ ।। क्षमस्व नचिरादिन्द्र त्वामप्युपगमिष्यति । इन्द्र! मैं सदा सावधान रहता था, तथापि कभी आलस्य न करनेवाले कालका यदि मुझपर आक्रमण हो गया तो तुमपर भी शीघ्र ही उस कालका आक्रमण होगा। इस कटु सत्यके लिये मुझे क्षमा करना ।। ६६ १/२ ।। त्रासयन्निव देवेन्द्र वाग्भिस्तक्षसि मामिह ।। ६७ ।। संयते मयि नूनं त्वमात्मानं बहु मन्यसे । देवेन्द्र! इस समय भयभीत करते हुए-से तुम यहाँ अपने वाग्बाणोंसे मुझे छेदे डालते हो। मैं अपनेको संयममें रखकर शान्त बैठा हूँ; इसीलिये अवश्य तुम अपनेको बहुत बड़ा समझने लगे हो ।। ६७ १/२ ।। कालः प्रथममायान्मां पश्चात् त्वामनुधावति ।। ६८ ।। तेन गर्जसि देवेन्द्र पूर्वं कालहते मयि । देवराज! जिस कालका पहले मुझपर धावा हुआ है, वही पीछे तुमपर भी चढ़ाई करेगा। मैं पहले कालसे पीड़ित हो गया हूँ; इसीलिये तुम सामने खड़े होकर गरज रहे हो ।। ६८ १/२ ।। को हि स्थातुमलं लोके मम क्रुद्धस्य संयुगे ।। ६९ ।। कालस्तु बलवान् प्राप्तस्तेन तिष्ठसि वासव । अन्यथा संसारमें कौन ऐसा वीर है, जो युद्धमें कुपित होनेपर मेरे सामने ठहर सके। इन्द्र! बलवान् काल (अदृष्ट) ने मुझपर आक्रमण किया है, इसीसे तुम मेरे सम्मुख खड़े हुए हो ।। ६९ १/२ ।। यत् तद् वर्षसहस्रान्तं पूर्णं भवितुमर्हति ।। ७० ।। यथा मे सर्वगात्राणि न सुस्थानि महौजसः । अहमैन्द्राच्च्युतः स्थानात् त्वमिन्द्रः प्रकृतो दिवि ।। ७१ ।। देवताओंका वह सहस्रों वर्षका समय अब पूरा होना ही चाहता है, जबतक कि तुम्हें इन्द्रके पदपर रहना है। कालके ही प्रभावसे मुझ महाबली वीरके अब सारे अंग उतने स्वस्थ