महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1497, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंनहीं रह गये हैं। मैं इन्द्रपदसे गिरा दिया गया और तुम स्वर्गमें इन्द्र बना दिये गये ॥ सुचित्रे जीवलोकेऽस्मिन्नुपास्यः कालपर्ययात् । किं हि कृत्वा त्वमिन्द्रोऽद्य किं वा कृत्वा वयं च्युताः ॥ ७२ ॥ कालके उलट-फेरसे ही इस विचित्र जीवलोकमें तुम सबके आराध्य बन गये हो। भला बताओ तो तुम कौन-सा शुभ कर्म करके आज इन्द्र हो गये और हम कौन-सा अशुभ कर्म करके इन्द्रपदसे नीचे गिर गये ॥ कालः कर्ता विकर्ता च सर्वमन्यदकारणम् । नाशं विनाशमैश्वर्यं सुखं दुःखं भवाभवौ ॥ ७३ ॥ विद्वान् प्राप्यैवमत्यर्थं न प्रहृष्येन्न च व्यथेत् । काल (प्रारब्ध) ही सबकी उत्पत्ति और संहारका कर्ता है। दूसरी सारी वस्तुएँ इसमें कारण नहीं मानी जा सकतीं; अतः विद्वान् पुरुष नाश-विनाश, ऐश्वर्य, सुख-दुःख, अभ्युदय या पराभव पाकर न तो अत्यन्त हर्ष माने और न अधिक व्यथित ही हो ॥ ७३ १/२ ॥ त्वमेव हीन्द्र वेत्थास्मान् वेदाहं त्वां च वासव ॥ ७४ ॥ किं कथसे मां किं च त्वं कालेन निरपत्रपः । इन्द्र! हम कैसे हैं, यह तुम्हीं अच्छी तरह जानते हो। वासव! मैं तुम्हें भली-भाँति जानता हूँ; फिर भी तुम लज्जाको तिलाञ्जलि दे क्यों मेरे सामने व्यर्थ आत्मश्लाघा कर रहे हो। वास्तवमें काल ही यह सब कुछ करा रहा है ॥ ७४ १/२ ॥ त्वमेव हि पुरा वेत्थ यत् तदा पौरुषं मम ॥ ७५ ॥ समरेषु च विक्रान्तं पर्याप्तं तन्निदर्शनम् । पहले मैं जो पुरुषार्थ प्रकट कर चुका हूँ, उसको सबसे अधिक तुम्हीं जानते हो। कई बारके युद्धोंमें तुम मेरा पराक्रम देख चुके हो। इस समय एक ही दृष्टान्त देना काफी होगा ॥ ७५ १/२ ॥ आदित्याश्चैव रुद्राश्च साध्याश्च वसुभिः सह ॥ ७६ ॥ मया विनिर्जिताः पूर्वं मरुतश्च शचीपते । त्वमेव शक्र जानासि देवासुरसमागमे ॥ ७७ ॥ शचीवल्लभ इन्द्र! पहले जब देवासुरसंग्राम हुआ था, उस समयकी बात तुम्हें अच्छी तरह याद होगी। मैंने अकेले ही समस्त आदित्यों, रुद्रों, साध्यों, वसुओं तथा मरुद्गणोंको परास्त किया था ॥ ७६-७७ ॥ समेता विबुधा भग्नास्तरसा समरे मया । पर्वताश्चासकृत् क्षिप्ताः सवनाः सवनौकसः ॥ ७८ ॥ सटङ्कशिखरा भग्नाः समरे मूर्ध्नि ते मया । किं नु शक्यं मया कर्तुं कालो हि दुरतिक्रमः ॥ ७९ ॥