भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1501

नश्यन्त्यर्थास्तथा भोगाः स्थानमैश्वर्यमेव च ॥ १०० ॥ जीवितं जीवलोकस्य कालेनागम्य नीयते । ‘धन और भोग नष्ट हो जाते हैं। स्थान और ऐश्वर्य छिन जाता है तथा इस जीव-जगत्‌के जीवनको भी काल आकर हर ले जाता है ॥ १०० १/२ ॥’

उच्छ्राया विनिपातान्ता भावोऽभावः स एव च ॥ १०१ ॥ अनित्यमध्रुवं सर्वं व्यवसायो हि दुष्करः । ‘ऊँचे चढ़नेका अन्त है नीचे गिरना तथा जन्मका अन्त है मृत्यु। जो कुछ देखनेमें आता है, वह सब नाशवान् है, अस्थिर है तो भी इसका निरन्तर स्मरण रहना कठिन हो जाता है ॥ १०१ १/२ ॥’

सा ते न व्यथते बुद्धिरचला तत्त्वदर्शिनी ॥ १०२ ॥ अहमासं पुरा चेति मनसापि न बुद्ध्यते । ‘अवश्य ही तुम्हारी बुद्धि तत्त्वको जाननेवाली तथा स्थिर है, इसीलिये उसे व्यथा नहीं होती। मैं पहले अत्यन्त ऐश्वर्यशाली था, इस बातको तुम मनसे भी स्मरण नहीं करते ॥ १०२ १/२ ॥’

कालेनाक्रम्य लोकेऽस्मिन् पच्यमाने बलीयसा ॥ १०३ ॥ अज्येष्ठमकनिष्ठं च क्षिप्यमाणो न बुद्ध्यते । ‘अत्यन्त बलवान् काल इस सम्पूर्ण जगत्‌पर आक्रमण करके सबको अपनी आँचमें पका रहा है। वह इस बातको नहीं देखता है कि कौन छोटा है और कौन बड़ा? सब लोग कालाग्निमें झोंके जा रहे हैं, फिर भी किसीको चेत नहीं होता ॥ १०३ १/२ ॥’

ईर्ष्याभिमानलोभेषु कामक्रोधभयेषु च ॥ १०४ ॥ स्पृहामोहाभिमानेषु लोकः सक्तो विमुह्यति । ‘लोग ईर्ष्या, अभिमान, लोभ, काम, क्रोध, भय, स्पृहा, मोह और अभिमानमें फँसकर अपना विवेक खो बैठे हैं ॥’

भवांस्तु भावतत्त्वज्ञो विद्वान् ज्ञानतपोऽन्वितः ॥ १०५ ॥ कालं पश्यति सुव्यक्तं पाणावामलकं यथा । कालचारित्रतत्त्वज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः ॥ १०६ ॥ विवेचने कृतात्मासि स्पृहणीयो विजानताम् । सर्वलोको ह्ययं मन्ये बुद्ध्या परिगतस्त्वया ॥ १०७ ॥ ‘परंतु तुम विद्वान्, ज्ञानी और तपस्वी हो। समस्त पदार्थोंके तत्त्वको जानते हो। कालकी लीला और उसके तत्त्वको समझते हो। सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण हो। तत्त्वके विवेचनमें कुशल, मनको वशमें रखनेवाले तथा ज्ञानी पुरुषोंके आदर्श हो। इसीलिये हाथपर रक्खे हुए आँवलेके समान कालको स्पष्टरूपसे देख रहे हो। मेरा तो ऐसा विश्वास है कि तुमने अपनी बुद्धिसे सम्पूर्ण लोकोंका तत्त्व जान लिया है ॥ १०५—१०७ ॥’