भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1511, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1511

भृतपुत्रा भृतामात्या भृतदारा ह्यनीर्षवः ॥ ३२ ॥ उनमें श्रद्धा थी। वे क्रोधको जीत चुके थे। वे दानी थे। दूसरोंके गुणोंमें दोषदृष्टि नहीं रखते थे और ईर्ष्यारहित थे। वे स्त्री, पुत्र और मन्त्री आदिका भरण-पोषण करते थे ॥ ३२ ॥ अमर्षेण न चान्योन्यं स्पृहयन्ते कदाचन । न च जातूपतप्यन्ति धीराः परसमृद्धिभिः ॥ ३३ ॥ अमर्षवश कभी एक-दूसरेके प्रति लाग-डाँट नहीं रखते थे। सभी धीर स्वभावके थे। दूसरोंकी समृद्धियोंसे उनके मनमें कभी संताप नहीं होता था ॥ ३३ ॥ दातारः संगृहीतार आर्याः करुणवेदिनः । महाप्रसादा ऋजवो दृढभक्ता जितेन्द्रियाः ॥ ३४ ॥ वे दान देते, कर आदिके द्वारा धन-संग्रह करते तथा आर्य-जनोचित आचार-विचारसे रहते थे। वे दया करना जानते थे। वे दूसरोंपर महान् अनुग्रह करनेवाले थे। वे सभी सरल स्वभावके और दृढ़तापूर्वक भक्ति रखनेवाले थे। उन सबने अपनी इन्द्रियोंपर विजय पायी थी ॥ ३४ ॥ संतुष्टभृत्यसचिवाः कृतज्ञाः प्रियवादिनः । यथार्हमानार्थकरा ह्रीनिषेवा यतव्रताः ॥ ३५ ॥ वे अपने भृत्यों और मन्त्रियोंको संतुष्ट रखते थे। कृतज्ञ और मधुरभाषी थे। सबका समुचित रूपसे सम्मान करते, सबको धन देते, लज्जाका सेवन करते और व्रत एवं नियमोंका पालन करते थे ॥ ३५ ॥ नित्यं पर्वसु सुस्नाताः स्वनुलिप्ताः स्वलंकृताः । उपवासतपःशीलाः प्रतीता ब्रह्मवादिनः ॥ ३६ ॥ सदा ही पर्वोंपर विशेष स्नान करते, अपने अंगोंमें चन्दन लगाते और सुन्दर अलंकार धारण करते थे। स्वभावसे ही उपवास और तपमें लगे रहते थे। सबके विश्वासपात्र थे और वेदोंका स्वाध्याय किया करते थे ॥ नैनानभ्युदियात् सूर्यो न चाप्यासन् प्रगेशयाः । रात्रौ दधि च सक्तूंश्च नित्यमेव व्यवर्जयन् ॥ ३७ ॥ दैत्य कभी प्रातःकाल सोये नहीं रहते थे। उनके सोते समय सूर्य नहीं उगते थे; अर्थात् वे सूर्योदयसे पहले ही जाग उठते थे। वे रातमें कभी दही और सत्तू नहीं खाते थे ॥ ३७ ॥ कल्यं घृतं चान्ववेक्षन् प्रयता ब्रह्मवादिनः । मङ्गल्यान्यपि चापश्यन् ब्राह्मणांश्चाप्यपूजयन् ॥ ३८ ॥ वे मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते, सबेरे उठकर घीका दर्शन करते, वेदोंका पाठ करते, अन्य मांगलिक वस्तुओंको देखते और ब्राह्मणोंकी पूजा करते थे ॥ ३८ ॥ सदा हि वदतां धर्मं सदा चाप्रतिगृह्णताम् ।