महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1512, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअर्धं च रात्र्याः स्वपतां दिवा चास्वपतां तथा ॥ ३९ ॥ सदा धर्मकी ही चर्चामें लगे रहते और प्रतिग्रहसे दूर रहते थे। रातके आधे भागमें ही सोते थे और दिनमें नहीं सोते थे ॥ ३९ ॥ कृपणानाथवृद्धानां दुर्बलातुरयोषिताम् । दयां च संविभागं च नित्यमेवान्वमोदताम् ॥ ४० ॥ कृपण, अनाथ, वृद्ध, दुर्बल, रोगी और स्त्रियोंपर दया करते तथा उनके लिये अन्न और वस्त्र बाँटते थे। इस कार्यका वे सदा अनुमोदन किया करते थे ॥ ४० ॥ त्रस्तं विषण्णमुद्विग्नं भयार्तं व्याधितं कृशम् । हृतस्वं व्यसनार्तं च नित्यमाश्वासयन्ति ते ॥ ४१ ॥ त्रस्त, विषादग्रस्त, उद्विग्न, भयभीत, व्याधिग्रस्त, दुर्बल और पीड़ितको तथा जिसका सर्वस्व लुट गया हो, उस मनुष्यको वे सदा ढाढ़स बँधाया करते थे ॥ ४१ ॥ धर्ममेवान्ववर्तन्त न हिंसन्ति परस्परम् । अनुकूलाश्च कार्येषु गुरुवृद्धोपसेविनः ॥ ४२ ॥ वे धर्मका ही आचरण करते थे। एक-दूसरेकी हिंसा नहीं करते थे। सब कार्योंमें परस्पर अनुकूल रहते और गुरुजनों तथा बड़े-बूढ़ोंकी सेवामें दत्तचित्त थे ॥ ४२ ॥ पितॄन् देवातिथींश्चैव यथावत् तेऽभ्यपूजयन् । अवशेषाणि चाश्नन्ति नित्यं सत्यतपोधृताः ॥ ४३ ॥ पितरों, देवताओं और अतिथियोंकी विधिवत् पूजा करते थे तथा उन्हें अर्पण करनेके पश्चात् बचे हुए अन्नको ही प्रसादरूपमें पाते थे। वे सभी सत्यवादी और तपस्वी थे ॥ ४३ ॥ नैकेऽश्नन्ति सुसम्पन्नं न गच्छन्ति परस्त्रियम् । सर्वभूतेष्ववर्तन्त यथाऽऽत्मनि दयां प्रति ॥ ४४ ॥ वे अकेले बढ़िया भोजन नहीं करते थे। पहले दूसरोंको देकर पीछे अपने उपभोगमें लाते थे। परायी स्त्रीसे कभी संसर्ग नहीं रखते थे। सब प्राणियोंको अपने ही समान समझकर उनपर दया रखते थे ॥ ४४ ॥ नैवाकाशे न पशुषु वियोनौ च न पर्वसु । इन्द्रियस्य विसर्गं ते रोचयन्ति कदाचन ॥ ४५ ॥ वे आकाशमें, पशुओंमें, विपरीत योनिमें तथा पर्वके अवसरोंपर वीर्यत्याग करना कदापि अच्छा नहीं मानते थे ॥ ४५ ॥ नित्यं दानं तथा दाक्ष्यमार्जवं चैव नित्यदा । उत्साहोऽथानहंकारः परमं सौहृदं क्षमा ॥ ४६ ॥ सत्यं दानं तपः शौचं कारुण्यं वागनिष्ठुरा । मित्रेषु चानभिद्रोहः सर्वं तेष्वभवत् प्रभो ॥ ४७ ॥