महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछोटे बच्चे आशा लगाये देखते रहते हैं और दानवलोग खानेकी चीजें स्वयं खा लेते हैं। सेवकों तथा अन्य सब कुटुम्बीजनोंको भूखे छोड़कर अपने खा लेते हैं ।। ६२ ।। पायसं कृसरं मांसमपूपानथ शष्कुलीः । अपाचयन्नात्मनोऽर्थे वृथा मांसान्यभक्षयन् ।। ६३ ।। खीर, खिचड़ी, मांस, पूआ और पूरी आदि भोजन वे सिर्फ अपने खानेके लिये बनवाते हैं तथा वे व्यर्थ ही मांस खाया करते हैं ।। ६३ ।। उत्सूर्यशायिनश्चासन् सर्वे चासन् प्रगेनिशाः । अवर्तन् कलहाश्चात्र दिवारात्रं गृहे गृहे ।। ६४ ।। अब वे सूर्योदय होनेतक सोने लगे हैं। प्रातःकालको भी रात ही समझते हैं। उनके घर-घरमें दिन-रात कलह मचा रहता है ।। ६४ ।। अनार्याश्चार्यमासीनं पर्युपासन्न तत्र ह । आश्रमस्थान् विधर्मस्थाः प्राद्विषन्त परस्परम् ।। ६५ ।। दानवोंके यहाँ अनार्य वहाँ बैठे हुए आर्य पुरुषकी सेवामें उपस्थित नहीं होते हैं। अधर्मपरायण दैत्य आश्रमवासी महात्माओंसे तथा आपसमें भी द्वेष रखते हैं ।। ६५ ।। संकराश्चाभ्यवर्तन्त न च शौचमवर्तत । ये च वेदविदो विप्रा विस्पष्टमनृचश्च ये ।। ६६ ।। निरन्तरविशेषास्ते बहुमानावमानयोः । अब उनके यहाँ वर्णसंकर संतानें होने लगी हैं। किसीमें पवित्रता नहीं रह गयी है। जो वेदोंके विद्वान् ब्राह्मण हैं और जो स्पष्ट ही वेदकी एक ऋचा भी नहीं जानते हैं, उन दोनोंमें वे दैत्यलोग कोई अन्तर या विशेषता नहीं समझते हैं और न उनका मान या अपमान करनेमें ही कोई अन्तर रखते हैं ।। ६६ १/२ ।। हारमाभरणं वेषं गतं स्थितमवेक्षितम् ।। ६७ ।। असेवन्त भुजिष्या वै दुर्जनाचरितं विधिम् । वहाँकी दासियाँ सुन्दर हार एवं अन्य आभूषण पहनकर मनोहर वेष धारण करतीं और दुराचारिणी स्त्रियोंकी भाँति चलती-फिरती, खड़ी होती और कटाक्ष करती हैं। साथ ही वे उस कुकृत्यको अपनाती हैं, जिसका आचरण दुराचारीजन करते हैं ।। ६७ १/२ ।। स्त्रियः पुरुषवेषेण पुंसः स्त्रीवेषधारिणः ।। ६८ ।। क्रीडारतिविहारेषु परां मुदमवाप्नुवन् । क्रीडा, रति और विहारके अवसरोंपर वहाँकी स्त्रियाँ पुरुषवेष धारण करके और पुरुष स्त्रियोंका वेष बनाकर एक-दूसरेसे मिलते और बड़े आनन्दका अनुभव करते हैं ।। ६८ १/२ ।। प्रभवद्भिः पुरा दायानर्हेभ्यः प्रतिपादितान् ।। ६९ ।। नाभ्यवर्तन्त नास्तिक्याद् वर्तन्तः सम्भवेष्वपि ।